हैप्पी बर्थ-डे नैनीताल

Nainital Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
नैनीताल। यूं तो 18 नवंबर रविवार को (आज) त्रिऋिषि सरोवर नगरी का 171वां बर्थ-डे और 172वां स्थापना दिवस मनाया जाएगा। इसमें शहर के सौंदर्य को बनाए रखने के संकल्प के साथ विविध कार्यक्रम किए जाएंगे। लेकिन शहर के इतिहास को केवल ब्रिटिश शासकों से मानना तर्क संगत नहीं है। शहर के सौंदर्य और समृद्धशाली अतीत का इतिहास अभी गर्त में है, जिस पर व्यापक शोध की दरकार है।
171 वर्ष पूर्व नैनीताल और इससे लगे 27 गांवों के स्वामी थे नरसिंह थोकदार। अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन नैनीताल पहुंचने पर यहां की खूबसूरती से प्रभावित हुए और इस रियासत को खरीदना चाहा। ऐतिहासिक प्रमाण यह भी है कि सौदा न होने पर नौका विहार के बहाने वह थोकदार को नैनी झील में ले गए और शहर को अपने नाम करवा लिया। 18 नवंबर 1841 से यहां ब्रिटिश हुकूमत का दौर शुरू हुआ और नैसर्गिक सौंदर्य के शौकीन ब्रिटिश हुक्मरानों ने इसकी खूबसूरती में और भी बढ़ोतरी की। यहीं नहीं 1880 के भयावह भूस्खलन के बाद शहर को बचाने के लिए शहर की पहाड़ियों पांच दर्जन से अधिक नालों का निर्माण कराया, जो आज भी शहर की रक्त वाहिनियों के रूप में इसे जीवंत बनाए हुए हैं। आज शहर के बर्थ-डे के दिन सभी को शहर को बचाने के संकल्प के साथ आगे की कार्ययोजना तय करनी होगी।
शहर पर शोध कर रहे इतिहासकार प्रो. गिरजा पांडे का कहना है कि 14वीं शताब्दी की लोक गाथाओं में भी नैनीताल का जिक्र है। चंपावत के भौनकोट की धागा धौनानी रचित लोकगाथा नैना देवी दरबार ‘मैं जूूंला तेलको दियोड़ जलूंला...’ में भी नैनीताल का जिक्र है, जिसे रानीबाग मेले में अक्सर गाया जाता था। इसके अलावा पश्चिमी नेपाल के ठुस्कों में भी यहां का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि शहर के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए अभी गहन शोध की दरकार है। समाजसेवी राजेंद्र लाल साह, केके साह, गंगा प्रसाद साह, चेत सिंह बिष्ट आदि का कहना है कि नैनीताल के सुरक्षित भविष्य के लिए बेहतर नियोजन और शेष बची राजकीय और पालिका भूमि को पर्यावरण की दृष्टि से संरक्षित करना जरूरी है।

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