71 पुरखों को मुक्ति चाहिए

Nainital Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। करीब 2500 वर्ष पहले राजा सागर के 60 हजार पुरखे जो कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गये थे उनकी मुक्ति का मार्ग उत्तराखंड से ही प्रशस्त हुआ था। राजा सागर के पौत्र भागीरथ की जटिल तपस्या से हिमालय रूपी शिव की जटाओं से होती हुई गंगा हरिद्वार के मैदान पर उतरी और भागीरथ के पुरखों को मुक्ति दी। लेकिन आज 2500 साल बाद भागीरथ की तपस्या से हमारे पास गंगा की अविरल धारा भी है तब देवभूमि के 71 लोग दशकों से मुक्ति का मार्ग तलाश रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनके अस्थि कलश हल्द्वानी के श्मशान घाट और बरसाती नहर स्थित क्रियाशाला में उनके अपनों ने ही छोड़ दिए हैं। कई अस्थि कलश तो मुक्ति की तलाश में फट चुके हैं लेकिन साल में दो-दो बार शराद करने वालों को पुरखों की याद नहीं आई।
गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय के 79वें श्लोक में भी कहा गया है कि दस दिन के भीतर यदि अस्थियां गंगा में प्रवाहित नहीं की तो मरने वाले की ब्रह्मलोक से पुनरावृत्ति नही होती। यह भी मान्यता है कि जितने समय तक अस्थि गंगाजल में रहती हैं उतने समय तक मनुष्य को स्वर्गलोक मिलता है। यही कारण है कि आज भी पाकिस्तान, अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय और विदेशी भी हर साल बड़ी संख्या में पुरखों की मुक्ति के लिए गंगा की शरण में आते हैं। लेकिन मुक्ति का मार्ग अपने ही देश में भटकने लगता है।
मुक्तिधाम समिति के महामंत्री राजकुमार केसरवानी बताते हैं कि हल्द्वानी की क्रियाशाला में 15 अस्थि कलश सालों से रखे हुए हैं। जो मुक्ति की राह तक रहे हैं। शमशान घाट में भी 56 अस्थि कलश हैं जिन्हें आज भी विसर्जन के लिए अपनों का इंतजार है। श्री केसरवानी ने बताते हैं कि अब लोग चिता जलाने के बाद विसर्जन के लिए अस्थि कलश छोड़ जाने की बात कहकर जाते हैं लेकिन लौटते नहीं। जबकि अस्थि विसर्जन में एक घंटे का भी समय नहीं लगता। उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 समिति ने तीन दर्जन से अधिक अस्थि कलशों का विसर्जन किया था। इस बार भी मुक्तिधाम समिति ने कार्तिक पूर्णिमा के बाद अस्थि कलशों के विसर्जन का निर्णय लिया है ताकि पुरखों को मुक्ति मिले। इस संबंध में डा. भुवन चंद्र त्रिपाठी और पंडित गोपाल दत्त भट्ट का कहना है कि जब तक अस्थि कलश का विसर्जन नहीं किया जाता तब तक पुरखों को मुक्ति नहीं मिलती। अस्थियां दस दिन के भीतर और अधिक से अधिक तीन महीने में विसर्जित कर दी जानी चाहिए।

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