हिफाजत यहां और अधिकार वहां

Nainital Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। एक लंबी लड़ाई और शहादत से जिस हिमालयी राज्य का उदय हुआ था, उसके जश्न-ए-जन्म का दिन करीब है। नौ नवंबर को उत्तराखंड बाल अवस्था पूरी कर किशोरावस्था की दहलीज पर पांव रखेगा। यूपी से अलग होने के बाद 12 वर्षों के इस सफर में क्या हुआ, क्या होगा की उधेड़बुन और सियासत की उठापटक तो बहुत चली, लेकिन सुलगते सवाल अब भी राज्य को झुलसा रहे हैं। जिस पानी और जवानी की उपयोगिता के नाम पर हिमालय की पीठ ठोंकी जाती है उसी हिमालय का पानी 12 बरस से उत्तर प्रदेश के खेत सींच रहा है।
उत्तर प्रदेश से अलग होने के बावजूद परिसंपत्तियों के बंटवारे के मामले में उत्तराखंड को सिर्फ ठेंगा दिखाया गया। अकेले कुमाऊं में ही सिंचाई विभाग की अरबों रुपये की संपत्ति पर आज भी यूपी का हक है। चाहे वह बड़े जलाशय हों या फिर छोटी नहरें। नानकसागर, बैगुल, बौर, शारदा जैसे विशालकाय जलाशयों में हिमालय का पानी भरता है, पर हिमालय की धरती में एकत्र होने वाले पानी से उत्तर प्रदेश में फसलें पैदा होती हैं। राज्य सिंचाई विभाग के लिए यह जलाशय सबसे महत्वपूर्ण हैं। अगर इन पर अधिकार मिलता तो सबसे बड़ा लाभ तराई को मिलने के साथ कृषि रकबे में बढ़ोत्तरी होती।
पर्वतीय क्षेत्रों को छोड़ तराई वाली बेल्ट में ही दो राज्यों के बीच संपत्ति का विवाद है। ऊधमसिंहनगर जिले में 99.2 किलोमीटर नहरों पर यूपी का नियंत्रण है। इसमें से केवल 44.197 किलोमीटर नहरें ऐसी हैं जिनसे यूपी-उत्तराखंड दोनों को पानी मिलता है। बाकी नहरें सिर्फ यूपी को सींचती हैं। इसी तरह टनकपुर की 6.017 किलोमीटर लंबी शारदा मुख्य नहर का पानी यूपी लेता है। काशीपुर में 9.75 किलोमीटर लंबी नहरें उत्तराखंड की जमीन में पड़ती हैं, जबकि 22.7 किलोमीटर नहरें दोनों राज्यों की सीमा पर। जमीन, भवनों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कुल मिलाकर उत्तराखंड इतने वर्षों से यूपी की संपत्ति की हिफाजत करता आ रहा है।


इंसेट
ये है तस्वीर

इतनी जमीन पर यूपी काबिज
सिंचाई खंड भूमि
रुद्रपुर 27.67 हेक्टेयर
काशीपुर 82.92 हेक्टेयर
लोहाघाट 1524.79 हेक्टेयर
इंसेट
भवन
खंड आवासीय गैर आवासीय
रुद्रपुर 242 28
लोहाघाट 95 33
इंसेट
ये जलाशय यूपी के पास
नानकसागर, धौरा, नगला, किच्छा, बौर, बैगुल, शारदा
इंसेट
इनका कहना
परिसंपत्तियों के बंटवारे के लिए केंद्र सरकार की मध्यस्थता में गंगा बोर्ड का गठन होना है। बोर्ड बनने के बाद ही यह तय होगा कि संपत्तियां किसे मिलेंगी। -डीसी सिंह, मुख्य अभियंता (उत्तर), सिंचाई विभाग।

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