न्याय की नई परिभाषा गढे़ंगे नये चेहरे

Nainital Updated Thu, 11 Oct 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। अधिवक्ता राजेश कुमार गोयल, उमेद कुमार, किशन चंद्र पांडे, हरिओम तिवारी और संगीता टाकुली कुछ ऐसे जवां नाम हैं जो कई धारणाओं को बदलते हैं। ये नाम पहला ताला उन लोगों के मुंह पर लगाते हैं जो आज की युवा पीढ़ी को भटका हुआ कहते हैं। ये वे युवा वकील हैं जो केवल रोजीरोटी के लिए वकालत के पेशे में नहीं आए। इनका मकसद तो लोकतंत्र के तीसरी स्तंभ न्यायपालिका में जान फूंकना है। ये युवा उन लोगों को न्याय दिलाना चाहते हैं जो मोटी फीस न दे पाने के कारण ताउम्र कोर्ट के चक्कर लगाते रह जाते हैं।
सिविल एवं दंड न्यायालय हल्द्वानी में ही युवा वकीलों की एक पूरी जमात है। हल्द्वानी में कुल 443 अधिवक्ता बार एसोसिएशन के सदस्य हैं। इनमें 50 फीसदी प्रैक्टिस तो बाकी 50 फीसदी नॉन प्रैक्टिस पर हैं। प्रैक्टिस के करीब 250 अधिवक्ताओं में से 35 अधिवक्ताओं की उम्र 25 से 30 साल के बीच है। ये सभी सिविल एवं दंड न्यायालय में बैठते हैं। जबकि 30 से 40 साल उम्र के अधिवक्ताओं की संख्या 70 तक है। कम उम्र के दर्जनभर अधिवक्ता इस समय ट्रेनिंग पर चल रहे हैं तो बाकी ने वकालत के बूते अदालत में खुद केस लेकर दलीलें शुरू कर दी हैं। न्यायलय में सात महिलाएं भी हैं तो 25-30 की उम्र में वकालती पेशे को अपने कैरियर के रूप में चुनकर इंसाफ की दहलीज तक पहुंची हैं। ये उस दौर के अधिवक्ता हैं जब नौजवानों का पहला लक्ष्य इंजीनियर या फिर डाक्टर बनने का रहता है। वकालत की पढ़ाई के लिए रुझान इसलिए भी नहीं, क्योंकि इसमें सुनहरे भविष्य की राह आसान नहीं है। पहले पढ़ाई और फिर अदालत में न्याय को गहराई से समझने के लिए व्यवहारिक ट्रेनिंग। न्यायालय में तकरीबन पांच साल लग जाते हैं एक अच्छा अधिवक्ता बनने में। इसके बावजूद नौजवानों के कदम अब इसी राह की तरफ हैं


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