रामराज्य या वर्चस्व की लड़ाई

Nainital Updated Sat, 29 Sep 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। रामलीला कमेटी के चुनाव में आस्था कम वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा हावी रही। भगवान राम की लीला का मंचन के लिए गठित की जाने वाली कमेटी का चुनाव न होकर यह किसी दल विशेष, क्षेत्र विशेष और जाति विशेष और समुदाय विशेष के लोगों के वर्चस्व और प्रतिष्ठा से जुड़ा चुनाव बनकर रह गया। गली मोहल्ले में हर तरफ कमेटी के लिए हुए घमासान को लेकर लोगों की जुबां पर एक ही शब्द था, यह भगवान राम के नाम पर कैसा चुनाव हो रहा है जिसके लिए इतना बवाल मचा हुआ है।
रामलीला कमेटी के चुनाव इतिहास में पहली बार ऐसा नजारा देखने को मिला जब मतदान के दौरान रामलीला मैदान के बाहर अलग-अलग गुटों के बस्ते लगे हुए थे। अध्यक्ष पद के प्रत्याशियों ने अपने-अपने पैनल बना रखे थे। बस्ते के पास बैठे समर्थक वोटरों को लुभाने के लिए अपने पैनल के सदस्यों के नाम पर वोट डालने के लिए प्रेरित कर रहे थे। एक प्रत्याशी ने तो रामलीला मैदान के गेट पर अपने नाम की पट्टी लगाए हनुमान का वेश धारी व्यक्ति खड़ा किया था। दावेदार वोटरों को आखिरी समय तक रिझाने में लगे रहे। इतना ही नहीं कमेटी में काबिज होने के लिए सौ से भी अधिक महिलाओं को सदस्य बनाया गया था जो बाकायदा मतदान करने रामलीला मैदान पहुंची थीं। शहर की सबसे पुरानी इस रामलीला कमेटी में काबिज होने के पीछे लोगों का मानना है कि सभी लोग अपने निहितार्थ इसमें देख रहे हैं। रामलीला कमेटी के पास अकूत जायदाद है। रामलीला मैदान, मंगल पड़ाव होली ग्राउंड समेत रामलीला मोहल्ला, सदर बाजार, लाइन नंबर एक, लाइन नंबर आठ में कमेटी की संपत्ति है। रामलीला मैदान को दीवाली पर पटाखों की दुकानों के अलावा विभिन्न धार्मिक और अन्य अवसरों पर किराए पर उठाया जाता है। लोगों का मानना है कि कुछ लोग अपने प्रियजनों को प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने के लिए भी कमेटी में आना चाहते हैं। भला श्रीराम की लीला का मंचन और मंचन कराने वाली संस्था पर काबिज होने के लिए मचे घमासान को किस रूप में लिया जा सकता है। दिनभर जिस तरह का माहौल रहा उसके पीछे कोई न कोई मंशा जरूर झलकती है।

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