गजराज से हमारी फसल बचाओ

Nainital Updated Sun, 23 Sep 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। खेतों में लहलहाती फसल को गजराज और अन्य वन्य जीवों द्वारा बर्बाद करने से भड़के करीब आधा दर्जन गांवों के काश्तकारों ने रेंजर समेत वन अफसरों को हरिपुर जमनसिंह गांव में घेर लिया। किसानों की करीब एक घंटे तक वन अफसरों से तीखी नोकझोंक हुई। किसानों ने वन अफसरों को बंधक बनाने की कोशिश की लेकिन रात्रि गश्त बढ़ाने के आश्वासन पर उनका गुस्सा शांत हुआ।
टांडा के घने जंगल को फांद गजराज का झुंड हफ्तेभर से हरिपुर जमनसिंह, चांदनीचौक तिल्ला, चांदनीचौक गरवाल, चांदनीचौक सांगुड़ी समेत करीब आधा दर्जन गांवों में फसलों को चौपट करने में तुला है। काश्तकारों का कहना है कि पहले फसल उगाने को खून पसीना बहाते हैं और अब लहलहाती फसल हाथियों एवं अन्य वन्य जीवों से बचाने को अंधेरी रात में पहरेदारी करनी पड़ रही है। इस समय इन गांवों में गन्ना, मक्का, धान और सोयाबीन की फसल से खेत लहलहा रहे हैं। धान के पौधे हाथियों के भारी भरकम पैरों तले दबकर मिट्टी में दफन हो चुके हैं। गन्ना बाजार तक पहुंचने से पहले ही उजड़ने लगा है और मक्के के पौधे खेतों में जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। हाल यह हैं कि मेहनत पर पानी फेर रहे गजराज को रोकने के लिए काश्तकारों को रातभर जागरण करना पड़ता है।
शनिवार को हरिपुर जमनसिंह गांव पहुंचे तराई पूर्वी वन प्रभाग के भाखड़ा रेंज के रेंजर आरपी हिंगवान, वन दरोगा गिरीश चंद्र रजवार के साथ ही बीट अधिकारी माधो राम को किसानों ने रास्ते में ही घेर लिया। रेंजर तथा दरोगा के साथ एक घंटे तक बहस होने के बाद ग्रामीण इन्हें बंधक बनाने पर आमादा हो गए लेकिन रात्रि गश्त बढ़ाने का भरोसा दिलाने पर ही गुस्सा शांत हुआ। घेराव में पूरन प्रकाश, विपिन जोशी, नरेश बृजवाल, राजीव सिंह, पान सिंह, तेज सिंह, बसी राम, किशन सिंह, विनोद बिष्ट, नंदन सिंह आदि काश्तकार शामिल थे।
हर साल झेलते हैं नुकसान
इन गांवों में हाथियों के आतंक का यह कोई पहला वाकया नहीं। हर साल फसलों के उगने के बाद गजराज गांवों को अपना टारगेट बनाते हैं। वन विभाग का मानना है कि टांडा के जंगलों में बीते कुछ वर्षों से हाथियों की संख्या बढ़ी है। भटकते हुए वह गांव तक पहुंच रहे हैं। एक बार फसलें दिख जाने के बाद हाथी की तब तक गतिविधियां रहती हैं, जब तक उसे जमीन खाली न मिले।
सैकड़ों किसान प्रभावित
काश्तकार बचीराम जोशी, किशन सिंह नेगी, आनंद बल्लभ दानी, प्रकाश चंद आदि का कहना है कि शाम आठ बजे से हाथियों का झुंड गांवों में पहुंचने लगता है। इन्हें भगाने के लिए शोरशराबे के साथ-साथ टिन के कनस्तर बजाने पड़ते हैं। इस पहरेदारी में ही रात चली जाती है। सुबह पांच बजे तक हाथी गांवों में रहते हैं। करीब एक सौ किसान हाथियों से प्रभावित हैं।

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