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फौलाद से शरीर को लील रहा नशा

Nainital Updated Tue, 28 Aug 2012 12:00 PM IST
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हल्द्वानी। फौलाद से शरीर में लचीलापन और सुनहरे भविष्य के वर्तमान पर ही कोहरे की धुंधली चादर, यह पहाड़ की जवानी का कड़वा सच है। बदलती लाइफ स्टाइल कहें या फिर बेरोजगारी का तनाव। ‘जीना है तो पीना है’ की प्रवृत्ति पहाड़ के नौजवानों को बर्बादी की दहलीज पर खड़ा कर रही है। वहीं, जिनसे मां, बाप की अपेक्षाएं, उनके भविष्य के सपने जुड़े हैं, यह सब उम्र के पहले पड़ाव में ही नशे की भेंट चढ़ रहा है।
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युवा वर्ग में नशे की प्रवृत्ति कोई नहीं बात नहीं, लेकिन नशे का आदी होना और समय से पहले ही शरीर का बीमारियों की गिरफ्त में जकड़ना उजड़ती जवानी की चिंताजनक तस्वीर है। जब ताकत और सोचने, समझने की क्षमता क्षीर्ण होने लगे तब नशा छोड़ने की याद आती है, मगर फिर इसका फायदा कुछ नहीं। निर्वाण नशा मुक्ति केंद्र के आंकड़े यह तस्दीक करते हैं कि किस तरह पहाड़ की जवानी एक दौर में नशे को शगल बनाने के बाद उसकी आदी हो जाती है। नशामुक्ति केंद्र में सालाना 450 नशा रोगियों का उपचार होता है, इसमें 95 फीसदी युवा हैं। युवा भी 16 से 25 और 25 से 35 साल की उम्र के ज्यादा।
इस वर्ष एक अप्रैल से 31 जुलाई तक 202 लोग नशा रोगी केंद्र में दर्ज किए गए हैं। युवाओं की संख्या में इस साल भी वही इजाफा है जो बीते वर्षों में दिखा था। नशा केवल शराब का ही नहीं, बल्कि चरस, इंजेक्शन, कैप्सूल, स्मैक, दवाइयां, इनहेलेंट्स, मल्टी ड्रग, कोरेक्स और अफीम का भी है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि निर्वाण केंद्र में नशे की लत पड़ने के बाद ही नौजवानों का प्रवेश होता है, मतलब नशामुक्ति केंद्र में दस्तक देने वाले वो युवा हैं जिनकी जिंदगी बर्बाद हो चुकी। 40 से 60 साल के नशेड़ियों के मुकाबले यूथ की नशाखोरी में बढ़ती तादाद पहाड़ की जवानी की बात का दम निकालती है। यही नहीं नशे का आदी होने के दस साल बाद लीवर भी युवाओं का साथ छोड़ रहा है।
नशाखोरी की तस्वीर
नशे का नाम संख्या (2011-12) (2012-13)
इंजेक्शन 28 10
कैप्सूल 43 05
स्मैक 20 32
शराब 253 110
चरस 40 15
टेबलेट 07 05
मल्टीड्रग 31 07
इनहेलेंट्स 16 04
कोरेक्स 07 07
अफीम 04 02
नोट-2012-13 के आंकड़े एक अप्रैल से 31 जुलाई तक के हैं।
लीवर डैमेज कर रही शराब
लीवर को शरीर का मुख्य अंग माना जाता है, लेकिन लिक्विड लीवर को ही डमेज कर रहा है। कुमाऊं में तराई-भाबर के साथ पहाड़ से हर माह 30 से 40 साल की उम्र के करीब चार युवा इलाज के लिए हल्द्वानी पहुंच रहे हैं। इस बीमारी का कारण शराब का रोजाना सेवन है। लीवर के रोगियों का इलाज करने वाले बृजलाल अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डा. अमरपाल सिंह कहते हैं युवाओं की स्थिति बेहद खराब है। वो तब इलाज के लिए आते हैं जब लीवर सिकुड़ने जाता है और खून की उल्टियां होने लगती हैं।
कोट-
16 से 25 साल तक के युवा हर माह नशा छुड़वाने के लिए पहुंच रहे हैं। नशे का एक बार आदी होने के बाद उससे मुक्ति पाने में लंबा समय लगता है। दिक्कत यह है कि नशा युवाओं के सोचने की क्षमता को खत्म कर रहा है।
-रश्मि रावल पंत, प्रोजेक्ट इंचार्ज, निर्वाण नशामुक्ति केंद्र हीरानगर, हल्द्वानी।

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