कितने उन्मुक्त, कितने धोनी

Nainital Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
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हल्द्वानी। रविवार को आस्ट्रेलिया के टाउंसविले में उन्मुक्त की शानदार बल्लेबाजी देख रेहान भाई को नैनीताल के फ्लैट्स का वह रविवार याद आ गया जब उन्होंने भारतीय टीम के मध्यम तेज गेंदबाज संजीव शर्मा के पहले ओवर में दो छक्कों की मदद से 16 रन जड़े थे। संजीव शर्मा को देशभर के क्रिकेट प्रेमी जानते होंगे लेकिन रेहान भाई से तो उनकी हल्द्वानी में ही कई लोग परिचित नहीं। रेहान भाई का पूरा नाम मोहम्मद रेहान है। उनके कमरे में धूल फांक रहीं अनगिनत ट्राफियां बताती हैं कि इस क्रिकेटर को अगर मौका मिला होता तो हमारे धोनी और उन्मुक्त आज झारखंड और दिल्ली की शरण में न जाते।
रेहान भाई ही क्यों, अपनी दुकान पर बैठकर क्रिकेट देख रहे दीपक मेहरा की आंखों में भी पिछड़ जाने की अजीब सी कोफ्त है। दीपक कहते हैं उन्होंने अपनी जवानी के सबसे महत्वपूर्ण 15 साल क्रिकेट को दिए। उत्तराखंड में कुछ नहीं मिला तो तीन साल दिल्ली में संघर्ष किया। लेकिन व्यवस्था और जुगाड़ के देश में दीपक की एक न चली। पूरा एक साल लगा दिल्ली में एक क्लब के संपर्क में आने में। एक साल बाद किसी तरह क्लब से जुड़े लेकिन यहां भी मैदान में उतरने को जुगाड़ चाहिए। किसी बड़े खिलाड़ी की नजर पड़ती इस होनहार पर तब आर्थिक स्थिति के मैदान में यह बेहतरीन आलराउंडर हार गया और थक के लौट आया एक ‘उन्मुक्त’ अपने घर की ओर। नौकरी की उम्र निकल चुकी थी, खेल से प्यार था तो आज दीपक तिकोनिया में अपनी स्पोर्ट्स की दुकान चलाते हैं।
कुछ ऐसी ही कहानी जगदीश बोरा और विजय बुक्साल की है। अपनी तारीफ में ये तो कुछ नहीं बोलते लेकिन रेहान भाई बताते हैं कि बायें हाथ के इन दोनों स्पिन गेंदबाजों के आगे रणजी खिलाड़ी भी नहीं टिकते थे। लेकिन संसाधनों के अभाव में क्रिकेट को कैरियर बनाने का इनका सपना परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ गया। ये तो केवल चार खिलाड़ियों का दर्द है जो हमारी व्यवस्थाओं से हार गए। ऐसे गुमनाम खिलाड़ियों की एक पूरी फेहरिस्त है उत्तराखंड में जिन्हें मौका मिलता तो आज हमारा ‘उन्मुक्त’ विश्वकप जीतकर दिल्ली न जाता अपने उत्तराखंड आता।


आगे भी उन्मुक्त, धोनी को बाहर जाना होगा
उत्तराखंड में क्रिकेटरोें के पास एक्सपोजर के लिए कोई मंच नहीं है। आगे भी उन्मुक्त और धोनी जैसे खिलाड़ियों को क्रिकेट में कैरियर बनाने के लिए बाहर ही जाना पड़ेगा। वरना यहां का टैलेंट यहीं खत्म होगा।
- दीपक मेहरा, पूर्व क्रिकेटर


कागजों में चल रही ऐसोसिएशन
उत्तराखंड में अभी छह क्रिकेट ऐसोसिएशन चल रही हैं। मेरे अनुमान से इसमें चार तो केवल कागजों में हैं। आपसी झगड़े के कारण एक भी ऐसोसिएशन को बीसीसीआई से मान्यता नहीं मिली है। मान्यता प्राप्त ऐसोसिएशन होती तो खिलाड़ियों को बडे़ टूर्नामेंट खेलने का मौका मिलता।
- मोहम्मद रेहान

उत्तराखंड में हाईस्कूल से आगे क्रिकेटरों के लिए मौके नहीं हैं। जिन लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक है वह लोग तो बंगलूरू, दिल्ली, लखनऊ और कोेलकाता क्रिकेट खेलने चले जाते हैं। वहां भी राज्य की टीम में आने के लिए उन्हें बड़ा संघर्ष करना पड़ता है। क्योंकि वहां की ऐसोसिएशन और क्लब अपने खिलाड़ियों को प्राथमिकता देते हैं।
- विजय बुक्साल, पूर्व क्रिकेटर

उत्तराखंड में यदि क्रिकेट को आगे बढ़ना है तो सबसे पहले ऐसोसिएशन को बीसीसीआई से मान्यता दिलानी होगी। यह मान्यता मिलने के बाद उत्तराखंड की टीम बनेगी जिसे रणजी ट्रॉफी में खेलने का मौका मिलेगा। इसके बाद ही उत्तराखंड के खिलाड़ी भारतीय टीम में आ सकते हैं।
- जगदीश बोरा, पूर्व क्रिकेटर

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