क्या सिपाही इंसान नहीं होते?

Nainital Updated Tue, 21 Aug 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। कंधों पर समाज की सुरक्षा का बोझ लिए वो घर से, अपनों से बहुत दूर हैं। उनके लिए घर बाद में है और अपनी जिम्मेदारी पहले। कहीं दंगा-फसाद हो जाए तो काबू करने के लिए उन्हीं का सहारा। लेकिन इस सबके बीच कुछ ऐसे सवाल जो शायद हर सिपाही के जेहन में उठते होंगे एक पीड़ा के साथ कि क्या सिपाही इंसान नहीं होते? क्या उन्हें ठीक से रहने-खाने का अधिकार नहीं? वो मां, वो बहन, वो पत्नी। हर किसी की जुबां ये कहते नहीं थकती होगी कि मेरा बेटा, भाई, सुहाग देश का सिपाही है। मगर वर्दी ने क्या दिया। दो जून की रोटी और जानवरों से भी बदतर जिंदगी। अगर जानना हो सिपाही का सच तो चले जाइये मंडी। हर सच्चाई खुद ही बयां हो जाएगी।
मंडी का एक लंबा चबूतरा इंडिया रिजर्व बटालियन (आईआरबी) की एक कंपनी यानि 100 सिपाहियों का ठिकाना है। चबूतरा चौतरफा खुला है सिवाए छत के। छत भी ऐसी कि आसमान नजर आता है। एक दो नहीं बल्कि अनेकों छेद। चबूतरे के इर्द-गिर्द कूड़े का ढेर और उसके बगल में सिपाहियों के सोने की जगह। खाना पकाने का तामझाम भी इसी चबूतरे में है। मच्छरों की फौज हर वक्त उनके साथ रहती है। सांझ ढलते ही एक नई मुश्किल अंधेरे में रात गुजारने की। दिन कट जाता है। लेकिन रात उनके लिए अझेल है। भोर होने पर नया सवाल शौचालय का। क्योंकि एक अदद टायलेट की सुविधा तक उनके लिए नहीं है।
जानवरों की तरह एक चबूतरे में भरे पड़े इन सिपाहियों की जिंदगी हल्द्वानी की ढोलक बस्ती से भी बदतर है। टिनशेड के भीतर कुछ टेंट लगे हैं। जिनके पास टेंट भी नहीं उन पर बारिश आफत बनकर टूटती है। रात बिताने, मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी लगी हैं, मगर बारिश से बचने का कोई इंतजाम नहीं। मंडी की इस कंपनी को नैनीताल जिले के लिए आरक्षित रखा गया है। यानि वर्षों से सिपाही नरक में छोड़े गए हैं। पर इस राज्य के सियासतदां तो दूर की बात, खुद पुलिस के आला अफसरों को ही सिपाहियों से सरोकार नहीं। दम घोंटू जीवन के बीच एक आशा अभी भी बाकी है कि क्या कोई मुक्ति दिलाने आएगा इस अस्तबल से? हमने जब शनिवार को मंडी में सिपाहियों की हालत देखी तो नारकीय जीवन की तस्वीर ने सारी सच्चाई बयां कर दी।

फोटो
पानी की कहानी भी अजब
चबूतरे से दो सौ मीटर की दूरी पर जमीन के भीतर से पानी का नल निकलता है। बिलकुल सीधा खड़ा। इस नल से ही आईआरबी जवानों की प्यास बुझती है, खाना पकता है। नहाने के लिए यही पानी और कपड़ धोने के लिए भी। पानी का फोर्स बेहद कम। ऊपर से पाइप सीधा होने से बर्तन भरने में दिक्कत। रात में प्यास लगे तो वहीं दौड़ना पड़ता है। सुबह लाइन लगती है अपने-अपने बर्तन भरने के लिए। जब घंटों प्रतीक्षा करो तो तब पानी मिल पाता है।

आर्म्ड फोर्स है आईआरबी
प्रांतीय सशस्त्र पुलिस (पीएसी) की तरह आईआरबी भी आर्म्ड फोर्स ही है। सिर्फ इसका नाम बदला हुआ है। पहले मंडी के चबूतरे में पीएसी की कंपनी रहती थी। लेकिन अब आईआरबी को यहां रखा गया है। यदि जिले में कहीं तनाव पैदा हो जाए तो यहीं से फोर्स रवाना होती है। मंडी की जगह पर पुलिस के आला अफसरों ने सशस्त्र पुलिस को बिठाया तो सिर्फ जानवर समझकर। वरना आज ये हाल न होते।

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