मोहन लाल भी थे भारत मां के सच्चे लाल

Nainital Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
नैनीताल। स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के लोगों ने अहम भूमिका निभाकर आजादी के इतिहास में कुमाऊं को अमर कर दिया। इनमें पंडित गोविंद बल्लभ पंत, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत, विक्टर मोहन जोशी, हर्षदेव ओली, रामसिंह धौनी, खुशीराम, तुलसी रावत आदि कई हस्तियां हैं, जिन्हें आज भी उनके योगदान के लिए याद किया जाता है। ऐसा ही एक नाम है मोहन लाल साह, हालांकि उम्र के मध्य पड़ाव में ही उन्होंने संसार से विदा ली, लेकिन इतनी उम्र में ही उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा को साबित किया। यही कारण है कि आज जहां उन्हें आजादी के लड़ाके के रूप में जाना जाता है, वहीं बैंकिंग तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष रूप से पूजा जाता है।
भारत देश तथा ठुलघरिया परिवार के इस लाल का जन्म 31 मई 1895 को दुर्गा साह-आनंदी देवी के घर में हुआ। 1919 में इलाहाबाद से स्नातक करने के बाद कुशाग्र बुद्धि के चलते 1923 में वह सरकार के खजांची रहे। इसके बाद उन्होंने परास्नातक तथा 1927 में एलएलबी कर 1929 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत प्रारंभ की। बैंकिंग क्षेत्र में उन्हें विशेष ख्याति थी, इसी कारण भारत सरकार ने बैंकिंग उद्योग से संबंधित समस्याओं की जांच के लिए नियुक्त समिति में उन्हें सदस्य बनाया। इसके अलावा यूपी इलेक्ट्रिसिटी इनक्वारी कमेटी तथा टेक्निकल कमेटी के भी वह सदस्य रहे।
सफल जनप्रतिनिधि के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। 1921 से 1924 तक वह नैनीताल म्युनिसिपल बोर्ड के सदस्य, 1933 में उप सभापति तथा 1935-36 में सभापति रहे। रानीखेत नगर पालिका में भी उन्होंने सदस्य तथा सभापति की जिम्मेदारिायां निभाई। 1937 में उन्होंने नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल जिलों के विधानसभा परिषद की सदस्यता का चुनाव लड़ा और कांग्रेस प्रत्याशी पंडित बद्री दत्त पांडे को पराजित किया था। इसमें साह को 212, पांडेय को 78 जबकि तीसरे प्रत्याशी पंडित देवी दत्त पंत को 59 मत प्राप्त हुए थे।
ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात के प्रमाण हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैचारिक परिवर्तन के चलते उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की। 1940 में उन्होंने ताड़ीखेत में सत्याग्रह शिविर में भी प्रतिभाग किया। व्यक्तिगत सत्याग्रह के चलते वह हल्द्वानी तथा अल्मोड़ा जेल में रहे। 1941 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। जेल गए और यातनाएं सहनी पड़ीं। 1942 में वह फिर से गिरफ्तार हुए। पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा पंडित केशव दत्त मालवीय ने अदालत में उनके पक्ष में सफाई दी, जबकि डा. कैलाशनाथ काटजू ने मुकदमे की पैरवी की। 1946 में वह दोबारा कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विधान परिषद सदस्य रहे। 51 वर्ष की अल्प आयु में 30 अगस्त 1946 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया।

सहकारिता के समर्थक थे साह
नैनीताल। लाला मोहन लाल साह को सहकारिता के समर्थक के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है। पढ़ाई पूरी करने के बाद संबंधित क्षेत्र में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया। 1928 में उन्होेेंने दुर्गा लाल मोहन लाल बैंक की स्थापना की। जिसे आज कूर्मांचल नगर सहकारी बैंक लिमिटेड के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा मोहन लाल साह बालिका विद्या मंदिर में आज भी सीबीएसई पाठ्यक्रम के आधार पर भविष्य की नई पौध तैयार की जा रही है। ब्यूरो

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