खुशनसीब हैं वो जिन्हें मां मिल जाती है

Nainital Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। जिंदगी के सफर में छूट जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते...। ये हकीकत है। लेकिन दीपा उन खुशनसीबों में है जिसके जीवन में वह मुकाम फिर लौट आया जो करीब 20 साल पहले पीछे छूट गया था। हालांकि दर्द और जुदाई के इन सालों ने दीपा की बोली और भाषा तक बदल डाली। जिन बच्चों को वह पति की गोद में छोड़ गई थी आज उनके अपने घर बस चुके हैं। 4 साल का नन्हा बेटा सूरज जो मां के जुदा होने से पहले सही से चलना भी नहीं सीख पाया था आज बांका जवान है और अपनी मां को चेन्नई से ले आया है। सूरज वह प्यार पाने को बेकरार है जिसके लिए उसने करीब एक पीढ़ी का इंतजार किया है।
बीस साल पहले एकाएक घर से गायब हुई नैनीताल के मल्लीताल निवासी दीपा पत्नी हरीश लाश शाह घर से कैसे चेन्नई पहुंची यह आज भी अबूझ पहेली है। उस देवता स्वरूप एनजीओ को वह कैसे मिली जिसने उसे 20 साल तक पाला, यह भी कोई नहीं जानता। बोली, भाषा के अंतर के कारण 50 साल की दीपा आज कुछ भी बताने में सक्षम नहीं है। हमने भी उस भयावह अतीत को कुरेदने की कोशिश नहीं की जिसमें एक मां को अपने कलेजे के टुकड़ों से अलग होना पड़ा था। हालांकि दीपा की बेटी रेखा उर्फ अर्चना जो अब गदरपुर वार्ड चार में अपने पति गुरप्रीत बटला और बच्चों के साथ रहती हैं बताती हैं कि बीस साल पहले एक दिन उनकी मां अपने मायके मल्ला गोरखपुर (हल्द्वानी) के लिए निकलीं और मगर लौटी नहीं। यहीं से शुरू हुई दर्द की दास्तां।
जुदाई के इन बीस सालों में दीपा ने भी बहुत कुछ सहा और उसके परिवार ने भी। अर्चना बताती हैं कि मां के गायब होने के बाद दो साल तक उन्होंने हर वह जगह तलाशी जहां मां के मिलने की उम्मीद थी लेकिन मिली निराशा। इसके बाद साल बीतते गए और दीपा के मिलने की उम्मीद धूमिल होती गई। आठ महीने पहले जब श्री हरीश लाल शाह का निधन हुआ तो दीपा के वापस आने की जो एक छोटी से किरण बची थी उसने भी दम तोड़ दिया। लेकिन जिसने दुनिया बनाई हो वह भी कैसे इतना बेरहम हो सकता है। तीन मई को हल्द्वानी कोतवाली में एक फोन आया और दीपा के बारे में पूछताछ हुई। अमर उजाला ने भी संवेदनशीलता के साथ मां और बच्चों को मिलाने का बीड़ा उठा लिया। चार मई को नैनीताल संस्करण में खबर प्रकाशित होने के बाद सूरज और उसकी बहन ने मां को लाने के प्रयास किए। सूरज और उसकी बहन अर्चना रविवार देर रात अपनी मां को लेकर गदरपुर पहुंचे तो अमर उजाला ने भी उनसे मुलाकात की।
दीपा आज भी गुमशुम है लेकिन अपने परिवार से मिलने की खुशी उसकी आंखों से झलकती है। बीस साल जिनके साथ रही उनसे बिछड़ने के गम से भारी तो है लेकिन नाती-पोतों की किलकारियां सब पर भारी हैं। दीपा आज कुमाऊंनी हिंदी से अधिक तमिल समझती हैं। टूटी फूटी हिंदी में ही उन्होंने बीस साल की कुछ यादें बताईं। उनके बीस साल एनजीओ में साईं बाबा की शरण में कटे। नैनीताल से चेन्नई कैसे पहुंची यह भी उन्हें सही से याद नहीं। दीपा का बेटा सूरज भी भयावह अतीत को याद नहीं करना चाहता। वह अमर उजाला को शुक्रिया कहता है और मां की गोद में सिर रखकर जी भर रोता है जिसके लिए उसने पूरे 20 साल इंतजार किया है।

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