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जमीन के निवेश में खप रहा काला धन

Nainital Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
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हल्द्वानी। इस शहर में जमीन के दाम सोेने की तरह खुलते - बंद होते हैं। कहीं कहीं तो महीने - दो महीने में रुपए फिट के हिसाब से बढ़ रहे हैं। सवाल ये है कि एकाएक ऐसा क्या हुआ कि सारी दुनिया हल्द्वनी में ही जमीन खरीदने को टूट पड़ी। दरअसल ये खेल उत्तराखंड बनने के बाद शुरू हुआ । जब तक हम लखनऊ से शासित थे खाने- खिलाने का हाजमा कम था क्योंकि एक तो स्थानीय नेता लखनऊ के अत्याचार- भेदभाव नाम पर उत्तराखंड की जनता को डराते-उकसाते थे। लखनऊ भी पहाड़ी नाराज न हो इसलिए फूंक- फूंक कर कदम रखता था। को उ 19 उत्तराखंडी विधायक उत्तर प्रदेश के सैकड़ों विधायकों में खो जाते थे। अपना राज्य बना सभी संसाधनों पर अपना कब्जा हो गया। भ्रष्टाचार और लूट का नया पाठ्यक्रम तैयार हुआ। वैसे कितनी ही विरोधी हों ये पार्टियां इस पाठ्यक्रम पर एक हैं। अन्य पहाड़ी राज्यों की तरह जमीन संबंधी अलग नियम न बना कर उत्तराखंडी नेताओं ने बाहरी काले धनपशुओं को हल्के से राज्य में ले लिया।
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कुमाऊं में ब्लैक मनी प्रवेश क रने से पहले प्रवेश द्वार हल्द्वानी में ब्लैक मनी खपाने के लिए बेस कैंप का काम करता है। इसीलिए यहां जमीन के दामों में बनावटी वृद्धि निरंतर बनी रहती है । बनावटी वृद्धि सफेदपोश नेता, व्यवसायी और सरकारी अधिकारी के काले पैसे से होती है , जिसकी राज्य बनते ही दूध-खीर की नदियां सी अपने यहां बहने लगी हैं । जब इस तरह से रात दिन दाम बढ़ते हैं तो आम आदमी भी पैसा टका बटोर कर इसी में पूंजी लगाता है। 70 फीसदी लोग निवेश के लिए जमीनों की खरीददारी कर रहे हैं। । जमीनों की खरीद फरोख्त में काला धन इस्तेमाल होने से प्रापर्टी की कीमतें आसमान छू गई हैं। आम आदमी के लिए जमीन का छोटा सा टुकड़ा खरीदना उसके बजट से बाहर हो गया है।
हल्द्वानी पहाड़ और मैदान का संगम है। कुमाऊं का पूरा कारोबार हल्द्वानी से संचालित होता है। रिहायश के लिए भी हल्द्वानी बेहतर जगह है। नौकरीपेशा कर्मचारी हो या फिर व्यापारी एवं कारोबारी सभी लोगों की रिहायश के लिए पहली पसंद हल्द्वानी है। हल्द्वानी में चिकित्सा, शिक्षा एवं दूसरी सभी सुविधाएं पर्याप्त नहीं तो पहाड़ से तो बेहतर है । पर्वतीय इलाकों से अधिकतर फौजी सेवानिवृत्ति के बाद परिवार समेत हल्द्वानी में पलायन कर रहे हैं। हल्द्वानी में जनसंख्या का दबाव बढ़ने से जमीनें कम पड़ने लगी हैं। शहरी से सटे आसपास के गांवों का अस्तित्व खत्म हो चुका है। गांवों में आलीशान कालोनियां खड़ी हो गई हैं। दूर दराज के गांवों में भी जोर शोर से प्लाटिंग चल रही है।
जमीनों की खरीद फरोख्त बढ़ने से कीमतें आसमान छू गई हैं। सर्किल रेट की तुलना में चार से पांच गुना महंगी जमीनों की खरीद फरोख्त हो रही हैं। शहर एवं आसपास इलाकों में जमीनें रि-सेल हो रही हैं। प्रत्येक रि-सेल में जमीन की कीमतें बढ़ रही हैं। महंगी जमीनों में काला धन खप रहा है। इनमें सफेदपोश नेताओं से लेकर व्यवसायी एवं बड़े अधिकारी सबसे बड़े निवेशक हैं। प्लाटों की कीमत सर्किल रेट के हिसाब से कई गुना अधिक हैं। छोटा-छोटा सरकारी अधिकारी , नेताओं ने ने परिवार के सदस्यों एवं रिश्तेदारों के नाम से बीघों के हिसाब से प्लाट खरीद कर डाल दिए हैं। कुछ नेताओं ने बिल्डरों में निवेश कर दिया है। ये नेता ही शहर में मास्टर प्लान नहीं लागू होने देना चाहते क्यों कि इसमें चौड़ी सड़कें और पार्क अनिवार्य होता है। नेता और उनसे जुड़े बिल्डर नहीं चाहेेंगे कि जन सुविधाओं में जमीन जाया हो।
प्रापर्टी कारोबार से जुड़े राकेश चौहान बताते हैं, प्रापर्टी में निवेश सबसे बेहतर माध्यम है। हल्द्वानी में नेताओं एवं अधिकारियों के प्राइम लोकेशन पर कई प्लाट हैं। प्लाटों में लगी पूंजी हर महीने बढ़ रही है। प्रापर्टी कारोबारी पारस बिष्ट बताते हैं, जमीनों के खरीददारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खरीददारों में मात्र 30 फीसदी लोग आशियाना बनाने के लिए प्लाट खरीद रहे हैं। 70 फीसदी लोग निवेश के लिए जमीनें खरीद रहे हैं। निवेश के लिए भूमि की खरीद फरोख्त होने से आम जरूरतमंद व्यक्ति के लिए मकान बनाने के लिए जमीन खरीदना उसके बजट से बाहर हो गया है।

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