राज्य बनने के बाद कुमाऊं में 182074 वृक्ष कटे

Nainital Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। वृक्ष हैं धरा के रक्षक, इन्हें बचाओ जीवन बचाओ! जब विकास की बात आती है तो वृक्षों की रक्षा के लिए दिया गया ये स्लोगन स्वत: दम तोड़ जाता है। विकास और पर्यावरण के बीच की लड़ाई में सदा जीत विकास की हुई है और बलि चढ़े हैं धरा की हरियाली साथी यानि वृक्ष। राज्य गठन के बाद अकेले कुमाऊं में विकास की खातिर एक लाख 82 हजार 74 पेड़ों पर आरी चल चुकी है। एक पौधे को वृक्ष बनने में कई वर्ष लगते हैं। लेकिन उन्हें काटने में चंद मिनट। नतीजा सबके सामने है।
सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं बेशक इंसान की जरूरत हैं और इन्हीं सुविधाओं के बदले में धरती से उसकी हरियाली उजड़ रही है। उत्तराखंड राज्य वजूद में आने के बाद जिस तेजी से वृक्षों का पातन हुआ, उसके बदले में दूसरी जगह पौधे जरूर लगे। लेकिन रोपे गए पौधों की देखरेख, सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है। एक पौधा अगले ही दिन वृक्ष नहीं बन जाता। जब तक कि उसकी उचित देखभाल न हो और पौधे से वृक्ष देखने के लिए बरसों इंतजार करना पड़ता है। कुमाऊं के नैनीताल, पिथौरागढ़, अल्मोड़, बागेश्वर तथा चंपावत जिले में 2002 के बाद सड़क, बिजली, पानी की योजनाओं के साथ-साथ विकास में शामिल अन्य कार्यों के लिए हर साल हजारों वृक्ष कट रहे हैं।
शून्य से 10 व्यास के वृक्षों को वन विभाग वृक्ष नहीं मानता। विकास के लिए वन भूमि में आने वाले 10 से 20 और इससे ऊपर व्यास के वृक्षों को काटने के लिए ही वन विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है। वन विभाग वृक्षों का छपान करता है और उन पर आरी चलाने का काम वन निगम का है। इन वर्षों में जीवन रक्षक वृक्ष तो खत्म हुए ही, इन पांच जिलों में करीब ढाई हजार हेक्टेयर वन भूमि जो कभी हरीभरी थी, उस पर अब सड़कें, कंक्रीट के ढांचे, बिजली पानी की लाइनें जम चुकी हैं। आज विश्व पर्यावरण दिवस है। पर्यावरण संरक्षण के लिए हर तरफ हो हल्ला होगा। इन आंकड़ों को देख आप तय कीजिए कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना क्या विकास की अवधारणा साकार नहीं हो सकती।

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