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मेघालय में नक्सली हमले में उतराखंड का जवान शहीद

Updated Mon, 30 Jul 2018 02:28 AM IST
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रामनगर का शहीद
रामनगर का शहीद - फोटो : अमर उजाला
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रामनगर (नैनीताल)। देश के लिए उत्तराखंड के एक और जवान ने अपनी जान न्योछावर कर दी। ग्राम छोई निवासी दीवान नाथ गोस्वामी मेघालय के कुर्र क्षेत्र के जंगल में नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए। 46 वर्षीय दीवान नाथ बीएसएफ की 141वीं बटालियन में जीडी/ड्राइवर पद पर तैनात थे और चार महीने बाद ही रिटायर होने वाले थे। उन्होंने वीआरएस के लिए आवेदन किया था। दो महीने की छुट्टी बिताकर आठ जुलाई को वह ड्यूटी पर लौटे थे। बताया जा रहा है कि सोमवार शाम तक शहीद का पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचेगा। एसडीएम परितोष वर्मा ने बताया कि उनके पास दीवान नाथ के शहीद होने की आधिकारिक सूचना नहीं है। फिर भी क्षेत्र के पटवारी को गांव भेजा गया है।
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दीवान के भाई विजय नाथ ने बताया कि शनिवार रात करीब 12 बजे उनकी भाभी के मोबाइल फोन पर दूसरी तरफ से सूचना दी गई कि दीवान नाथ के पैर पर गोली लगी है और उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है। जब रविवार सुबह उन्होंने फोन कर दीवान नाथ की हालत के बारे में पूछा तो पता चला कि उनका इलाज चल रहा है। यह भी बताया गया कि उन्हें हेलीकॉप्टर से दूसरे अस्पताल ले जाया जा रहा है। विजय नाथ ने बताया कि जब लखनऊ निवासी उनके जीजा ने जानकारी जुटाई तो पता चला कि दीवान नाथ गोस्वामी शहीद हो गए हैं। बाद में मेघालय के कमांडेंट ने भी फोन पर उनके शहीद होने की खबर दी। शहादत की खबर सुनते ही दीवान की मां पार्वती देवी, पत्नी गीता बदहवास हो गईं।



मेघालय में घात लगाकर किया नक्सलियों ने हमला
बीएसएफ में तैनात थे छोई रामनगर के दीवान नाथ गोस्वामी

मूल रूप से गरमपानी का रहने वाला है परिवार
मूल रूप से गरमपानी निवासी दीवान सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर के थे। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटियां आराध्या (5) और इशिका (2) हैं। उनके बड़े भाई गोपाल नाथ गोस्वामी कुमाऊंविश्वविद्यालय नैनीताल में कार्यरत हैं। छोटा भाई विजय नाथ गोस्वामी उत्तराखंड पुलिस में है और वर्तमान में अल्मोड़ा कोतवाली में तैनात है। शहीद की मौत की सूचना पर उनकी शादीशुदा बहनें पदमा, पुष्पा, तारा, प्रेमा भी गांव पहुंच गईं हैं। शोकाकुल परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का जमावड़ा उनके घर पर लगा हुआ है।

दीवान नाथ ने संजोए थे कई सपने
रामनगर (नैनीताल)। मेघालय में नक्सली हमले में शहीद दीवान नाथ गोस्वामी ने दूसरी पारी (रिटायरमेंट के बाद) के लिए कई सपने संजोए थे। वह चाहते थे कि मकान के पास ही अपनी दो बीघा जमीन पर रेस्टोरेंट बनाएं ताकि इसका लाभ हनुमान धाम आने वाले श्रद्धालुओं को मिल सके। उन्होंने इसकी पूरी तैयारी कर ली थी। बस इंतजार था वीआरएस अर्जी की मंजूरी का, लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।
दीवान के ममेरे भाई प्रेम ने बताया कि हाल में जब वह छुट्टी पर आए थे, उन्होंने अपनी योजना के बारे में उन्हें बताया था। उनका कहना था कि वीआरएस की अर्जी एक-दो महीने में मंजूर हो जाएगी। इसके बाद वह कारोबार के साथ अपने बच्चों को समय देंगे।

दोस्तों को आई याद, बहे आंसू
दीवान की शहादत की खबर जैसे ही दोस्तों को लगी तो सभी उनके घर पहुंच गए। सभी की आंखें नम थीं। दीवान के बचपन के साथी पवन जोशी और कमल मेहरा बताते हैं कि दीवान वह हंसमुख स्वभाव के थे। बचपन के दिनों को याद करते हुए पवन ने बताया कि वह जब गाय-भैसों को चराने के लिए जंगल में वे सभी मस्ती करते थे। एक बार तो बरसात के मौसम में दाबका नदी में भैंस की पूंछ पकड़कर पार करने लगे तो उनके (पवन के) हाथ से भैंस की पूंछ छूट गई, तब दीवान ने ही उन्हें नदी पार कराई थी। कमल मेहरा ने बताया कि एक बार बाग में लीची तोड़ने गए, तब दीवान बाग की रखवाली कर रहे थे। दोस्तों को देख उन्होंने शोर तो मचाया, लेकिन इशारे से लीची तोड़ने को भी कहते रहे।

...इसलिए लेना चाहते थे वीआरएस
शहीद दीवान नाथ गोस्वामी 1997 में बीएसएफ जीडी के पद पर भर्ती हुए थे। सर्विस के दौरान उनक ी बाएं पैर की नस ब्लॉक हो गई थी। इसका इलाज दिल्ली एम्स में भी चला था। इसी परेशानी को चलते वह नौकरी नहीं करना चाहते थे। इस कारण उन्होंने वीआरएस की अर्जी लगाई थी।

शहीद के घर पहुंचे हनुमान धाम मंदिर समिति के सदस्य
दीवान नाथ गोस्वामी की शहादत की खबर लगते ही श्री हनुमान धाम मंदिर समिति के महासचिव राजीव अग्रवाल, सचिव प्रेम जैन, राजेंद्र गोयल, संजीव जिंदल, दिनेश चंद्र दानी आदि शहीद के घर पहुंचे। शहीद के बड़े भाई गोपाल नाथ से मिलकर उनको ढांढस बंधाया और शोक संवेदना व्यक्त की।

नहीं पहुंचे अधिकारी, ग्रामीणों में गुस्सा
रविवार देर शाम तक शहीद के घर कोई भी अधिकारी नहीं पहुंचा और ना ही किसी ने संवेदना प्रकट की। प्रशासन की इस संवेदनहीनता से ग्रामीणों में गुस्सा है। महेश सत्यवली, पूरन चंद्र कांडपाल ने कहा कि डीएम से लेकर सभी अधिकारियों को शहीद के घर पहुंचना चाहिए था, लेकिन कोई भी नहीं आया।

‘कोई मुझे भी गोली मार दे...’
छोई (रामनगर)। पति की शहादत की खबर सुनी तो गीता के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन कुछ ही देर में वह बदहवास हो गईं।
घर में लोगों का तांता लगा था। लोग अपने-अपने ढंग से समझा रहे थे, लेकिन गीता दहाड़ें मारकर रो रहीं थीं। अपने बड़े भाई को सामने देखा तो रोते हुए कह पड़ीं ‘अब मेरा क्या होगा दादी (बड़ा भाई)। कोई मुझे भी गोली मार दे...।’ भाई ने सहारा दिया, मगर गीता के आंसू थम नहीं रहे थे। कहने लगीं पति को मारने वाला सामने आ जाए तो वह उसे गोली मार देंगी। बेटे के शहीद होने की खबर सुनकर मां की छाती फट गई। मां ने कहा कि उनका बेटा उनसे आराम करने को कहता था। बोलीं..दीवान कहता था कि ‘अगर मैं त्हैं बे पैलि मर गोय तो अलग बात छू मगर म्यर जीते जी तुकै काम करणेकि जरूरत नी छू....’ (अगर मैं तेरे से पहले मर गया तो अलग बात है मगर मेरे जीते जी तुझे काम करने की जरूरत नहीं)। शहीद की मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी। एक के बाद एक लोग जुट रहे थे। होगी भी क्यों नहीं, दीवान का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि वह हर किसी को अपना बना लेते थे।
‘मेरे पापा मेरे बर्थडे पर आएंगे’
शहीद की बड़ी बेटी आराध्या दूसरी और छोटी बेटी इशिका यूकेजी में पढ़ती हैं। दोनों बच्चियों को अपने पिता के दुनिया छोड़कर जाने का पता नहीं है। जब उनकी मां को लोग ढांढस बंधा दे रहे थे, तब दोनों बेटियां खेल रही थीं। मां को रोता देख कभी-कभी दोनों आंसू पोछती। आराध्या कह रह थी ‘मेरे पापा मेरे बर्थडे पर घर आएंगे’।
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