मानवाधिकारों पर सबका बराबर हक

Haridwar Updated Tue, 29 Jan 2013 05:30 AM IST
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हरिद्वार। एसएमजेएन पीजी कालेज में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के समापन के अवसर पर पूर्व डीन ने कहा कि मानवाधिकारों पर सबका बराबर हक है। देश, धर्म, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर इनको अलग नहीं किया जा सकता। वहीं सबकी सोच बदलने से ही मानवाधिकार स्थापित होने की सभी ने वकालत की।
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अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में डीन रहे प्रो. वीके तनेजा ने कहा कि सबको को एक दूसरे के अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए। मानवाधिकारों को सहेजने से ही प्रबंधन में उत्कृष्टता स्थापित की जा सकती है। डा. एनपी माहेश्वरी ने बताया कि सूचना का अधिकार और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम आज मानवाधिकारों को स्थापित कराने में एक हथियार के रूप में कार्य कर रहे हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के उप कुलपति प्रो. जेएस पुंडीर ने कहा कि केवल सोच बदलने की जरूरत है। मानवाधिकार और प्रबंधन में ऊंचाई स्थापित होने में देर नहीं लगेगी।

प्रेम प्रकाश भल्ला ने कहा कि उत्पादन के क्षेत्र में प्रबंधन और कामगार के बीच तनाव बढ़ना मानवाधिकार हनन को साबित करता है। यदि यह तनाव खत्म हो जाए तो बहुत कम समय में प्रबंधकीय उत्कृष्टता दिखने लगेगी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रो वाइस चांसलर प्रो. हवा सिंह ने कहा कि जब तक हमारी संवेदनाओं में सुधार नहीं आता तब तक मानवाधिकारों में सुधार लाना कठिन होगा।
इस मौके पर प्रो. वेदप्रकाश शास्त्री, पूर्व डीजीपी आईपीएस आरसी दीक्षित, डा. वीणा शास्त्री, प्रो, रवि भाटिया, डा. एससी वार्ष्णेय ने भी अपने विचार रखे। सेमिनार में महंत बिल्केश्वर गिरि, डा. अवनीत कुमार घिल्डियाल, डा. सरस्वती पाठक, डा. संजय माहेश्वरी, डा. जेसी आर्य, कार्यालयाध्यक्ष अश्वनी कुमार जगता आदि मौजूद रहे। प्राचार्य डा. सुनील कुमार बत्रा और आयोजन सचिव डा. तेजवीर तोमर ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने बताया कि सेमिनार में 170 प्रतिभागियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए।


शोर मचाने वाले देशों में मानवाधिकार का ज्यादा हनन
हरिद्वार। विद्वानों की माने तो मानवाधिकार का ढिंढोरा पीटने वाले देश सबसे अधिक इनका हनन करने में लगे हैं। आज केवल विकास की बातें करना बेमानी होगी, इसलिए मानवीय विकास को तरजीह दी जानी चाहिए। प्रबंधन की कमजोरी से ही व्यवस्थाएं चौपट होने का कारण गिनाए जा रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्र में मानवाधिकार हनन शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन बिना इसके भी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। यह विचार विशेषज्ञों ने सेमिनार में रखे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अत्याचार, शोषण, बंधुआ और बाल मजदूरी, गरीबी और अन्य विषमताओं से मानव समाज को छुटकारा दिलाने के लिए 10 दिसंबर 1948 को पेरिस में मानवाधिकार चार्टर में 30 अनुच्छेद तैयार किए गए। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रो. रवि भाटिया के अनुसार 2300 साल पहले सम्राट अशोक के समय में मानवाधिकार का पालन करने के लिए शासनादेश बनाया गया था। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार आयोग बनने के बाद भी जो देश इनका ज्यादा शोरशराबा करते हैं, वहीं इनका सबसे ज्यादा हनन किया जा रहा है।
एसडी कालेज मुजफ्फरनगर के डा. एससी वार्ष्णेय का कहना है कि संसाधनों का प्रयोग इस तरह होना चाहिए जिससे मानवीय अधिकारों का हनन किए बिना उनसे अधिकतम हासिल हो सके। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के डा. आरके दीक्षित ने कहा कि कुप्रबंधन के चलते देश की तमाम व्यवस्थाएं चौपट होती जा रही हैं। रेवेंसा विश्वविद्यालय कटक के डा. संजय सतपथी ने बताया कि 21वीं सदी में केवल विकास नहीं बल्कि मानवीय विकास की बात की जाने लगी हैं। क्याेंकि मानवीय संसाधन ही भौतिक संस्थाओं को गति देते हैं।

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