बड़े अखाड़े से पैदा हुई गंगा रक्षा चेतना

Haridwar Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
हरिद्वार। हाल ही में बड़ा अखाड़ा उदासीन के श्रीमहंत राजेंद्र दास के निधन से गंगा रक्षा चेतना एक बार फिर साधु-संतों में जाग्रत हो गई है। जल समाधि के साथ-साथ भू-समाधि को भी रोकने की चर्चाएं संतों के बीच चल पड़ी हैं। यदि सरकार ने उदारता का परिचय दिया होता तो गंगा जल में दी जाने वाली समाधि तो दो वर्ष पूर्व ही रुक गई होती।
गौरतलब है कि संन्यासियों और अन्य साधु-संतों को मृत्यु के बाद गंगा में प्रवाहित किया जाता है। विशेष रूप से संन्यासियों के सात अखाड़ों में तो जल समाधि अनिवार्य मानी जाती थी। लम्बे समय से जल समाधि के खिलाफ संत जगत में ही आवाज उठती आई है। वर्ष 2010 के कुम्भ से पूर्व अभा अखाड़ा परिषद ने इस आशय का प्रस्ताव पारित किया था कि यदि सरकार भू समाधि के लिए 150 हेक्टेयर भूमि प्रदान कर दे, तो हरिद्वार में जल समाधि बंद कर दी जाएगी। तत्कालीन सरकार ने आश्वासन देने के बावजूद आज तक भू आवंटन नहीं किया। फलस्वरूप जल और भू समाधि दोनों ही जारी हैं।
उदासियों के सबसे बड़े उदासीन अखाड़े ने कुछ वर्ष पूर्व तय कर लिया था कि वे अपने मृत संतों को जल समाधि अथवा भू समाधि नहीं देंगे। इस अखाड़े ने अग्नि संस्कार की परम्परा अंगीकृत कर ली थी। हाल ही में दिवंगत हुए श्रीमहंत राजेंद्र दास का जब अंतिम संस्कार किया गया, तो श्मशान घाट पर ही संतों ने भू समाधि और जल समाधि के खिलाफ आवाज उठानी प्रारम्भ कर दी थी। अब सभी अखाड़ों में अग्नि संस्कार के लिए चिंतन किया जा रहा है। संभव है कि प्रयाग कुम्भ में इस सम्बंध में एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया जाएगा।

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