मां चुड़ामणि पूरी करती है मन की मुराद

Haridwar Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
रुड़की। चुड़ियाला गांव स्थित सिद्धपीठ माता चुड़ामणि देवी मंदिर में नवरात्रों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। माता दरबार में पहुंचने वाले हर फरियादी की मुराद पूरी करती है। यही वजह है कि मंदिर में दूर दराज से भक्तगण दर्शन को पहुंचते हैं। खासकर, नवरात्रों में मन्नतें मांगने वालों का हुजूम उमड़ा हुआ है।
चुड़ामणि मंदिर के बारे में मान्यता है कि माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किए जाने से क्षुब्ध माता सती ने यज्ञ में कूद गई थी। इसके बाद भगवान शिव यहां पहुंचे और माता सती के मृत शरीर को ले गए। इस दौरान माता सती का चूड़ा इस घनघोर जंगल में गिर गया था। तभी से इस स्थान पर माता की पिंडी स्थापित हुई और सिद्ध पीठ प्राचीन मंदिर का रुप बन गया। माता के दर्शन को यहां श्रद्धालु दूर दराज से पहुंचते हैं। इन दिनों मंदिर में भव्य मेला भी आयोजित किया जा रहा है।

ऐसे हुए भव्य मंदिर का पुन: निर्माण
गांव के धर्मपाल त्यागी, बिशबंर सिंह कश्यप, धर्मवीर त्यागी आदि बताते हैं कि लंढौरा रियासत के राजा एक बार जंगल में शिकार करने आए हुए थे। जंगल में घूमते-घूमते उन्हें माता की पिंडी के दर्शन हुए। राजा के यहां कोई पुत्र नहीं थी, इसलिए माता से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी। पुत्र प्राप्ति होने के बाद राजा ने सन 1805 में इस जगह पर भव्य मंदिर बनवाया। देवी दर्शन को पहुंची रानी ने माता शक्ति कुंड की सिड़ियां बनवाईं।

शेर भी रोजाना टेकने आते थे पिंडी पर मत्था
जिस स्थान पर चुड़ामणि देवी का मंदिर है, वहां कभी घनघोर जंगल हुआ करता था। जहां हर तरफ शेरों की दहाड़ सुनाई पड़ती थी। मान्यता है कि कभी कि माता की पिंडी पर शेर भी रोजाना मत्था टेकने आते थे।

पुत्र प्राप्ति को लोकड़ा चढ़ाने की प्रथा
पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति मंदिर में आकर माता के चरणों से लोकड़ा (लकड़ी का गुड्डा) लेकर जाते हैं। पुत्र प्राप्ति के बाद अषाढ़ माह में दंपति पुत्र के साथ दोबारा ढोल नगाड़ों के साथ मां के दरबार में आते हैं। इस दौरान मंदिर में भंडारा आयोजित करने के साथ ही ले जाया गया लोकड़ा वापस मां के चरणों में रख जाते हैं। एक अन्य लोकड़ा भी पुत्र के हाथों से चढ़ाए जाने की परंपरा है। गांव की बेटियां भी विवाह के पश्चात पुत्र प्राप्ति के बाद लोकड़ा चढ़ाती हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पुराने स्वरूप में कायम है।

बाबा बण्खंडी का भी है धाम
माता चुड़ामणि के अटूट भक्त रहे बाबा बण्खंडी की समाधि भी मंदिर परिसर में है। बताया जाता है कि बाबा बण्खंडी माता के महान भक्त और संत हुए हैं। जिन्होंने 1909 में माता की भक्ति में लीन होते हुए समाधि ले ली थी।

पौराणिक धरोहर, पर उपेक्षा की शिकार
माता चुड़ामणि मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र होने के साथ ही पौराणिक धरोहर भी है, लेकिन सरकार ने कभी इस धरोहर की सुध नहीं ली। हालांकि, यहां आकर मंदिर के विकास के दावे मंत्रियों तक ने किए, मगर निभाए किसी ने नहीं। नेताओं की अनेकों घोषणाएं भी हवाई साबित हुई।

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