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पितरों की अमावस्या आज

Updated Mon, 15 Jan 2018 11:05 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
मौनी अमावस्या पर मौन का भी महत्व है। दिन भर मौन रहकर साधना करने से स्नान का अमिट फल प्राप्त होता है। इस बार पितृकार्य, व्रत और स्नान तीनों के लिए दो अलग- अलग दिनों का प्रयोग किया गया है। पंचांगों में काल गणना के चलते मौनी अमावस्या का पर्व दो दिन पड़ा है।
मंगलवार को पितरों के निमित श्राद्ध, तर्पण आदि का कर्म गंगा तीर्थों पर संपन्न कराया जाएगा। मौनी अमावस्या ऐसा पर्व है जिसका स्नान तो देश भर में होता है, लेकिन पितृकर्म गंगा तट पर बसे तीर्थों पर ही होते हैं। हरिद्वार के कुशावर्त घाट और नारायणी शिला पर श्राद्ध करने के लिए देश के अनेक भागों से श्रद्धालु पहुंच गए हैं। मकर संक्रांति का स्नान करने आए श्रद्धालु पितृकर्म करने के लिए रुके हुए हैं। बुधवार को गंगा स्नान के बाद इन यात्रियों की वापसी होगी। कृष्णपक्ष की पंचस्नानी एकादशी से प्रारंभ हो गई और अमावस्या तक चलेगी। इन पांच दिन का स्नान करने के लिए पंचस्नानी को आए श्रद्धालुओं का स्नान समापन भी मौनी अमावस्या के दिन होगा। मौनी अमावस्या का पर्व मनाने के लिए देश के विभिन्न भागों से श्रद्धालुओं का आगमन प्रारंभ हो गया है। विशेषरूप से पंजाब, राजस्थान से कम संख्या में श्रद्धालु पहुंचे है। समीपवर्ती जनपदों के श्रद्धालुओं के साथ साथ दिल्ली और पश्चिमी यूपी के स्नानार्थी गंगा स्नान करने आएंगे।

माघ मेले का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। प्रयाग तीर्थ पर पूरे एक महीने का मेला कुंभ के समान लगता है। हरिद्वार के गंगा तट पर डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालु आते रहे हैं। इस अमावस्या पर मौन रखने का विशेष महत्व है। यूं तो मौन साधना भारतीय संस्कृति के प्राण है और योग में भी मौन का महत्व बताया गया है, किंतु माघ अमावस्या के दिन मौन रहकर स्नान करने से अनेक जन्मों के पाप मिट जाते है। धर्म शास्त्रों के अनुसार माघ का स्नान जघंय पापों से भी मुक्ति देने वाला है। बशर्ते कि मौन रहकर प्रायश्चित किया जाए। अमावस्या के दिन हजारों श्रद्धालु मौन रहकर प्रायश्चित करते हुए भी गंगा में पांच गोतें लगाएंगे।
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