सुनीता के कोमल कंधों पर पूरी गृहस्थी का बोझ

Champawat Updated Fri, 14 Nov 2014 05:31 AM IST
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चंपावत। सुनीता (16) पढ़ना चाहती थी, लेकिन आठवीं के बाद उसका स्कूल छूट गया। उसके तीन और छोटे भाई-बहन हैं, जिनकी देखभाल और परवरिश का जिम्मा बीते तीन वर्षों से उसके नन्हें कंधों पर है। माता-पिता के साये से दूर इन बच्चों के लिए बचपन बेमानी है। पढ़ने की उम्र में काम सहित ढेरों दूसरी चिंताएं मुहं बाए हैं।
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जिले के दूरस्थ बुड़म गांव के इन नौनिहालों के लिए बचपन के न कोई अरमान हैं न सपने। बचपन की न कोई भाषा है न परिभाषा। उनके लिए बचपन के मायने सिर्फ संघर्ष है। मां शांति देवी 2009 और पिता जोगा राम 2011 में चल बसे। मा-बांप का साया छूटा, तो शुरू हुआ संघर्षों का सफर। हेमा छठी कक्षा, चंद्रा पांचवीं और भाई मिंटू दूसरी कक्षा में गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ रहे हैं। बड़ी बहन सुनीता इस नन्हीं उम्र में माता-पिता की तरह अपने तीन भाई-बहनों की परवरिश कर रही है। घर से लेकर स्कूल तक की सारी जिम्मेदारी वही निभाती है।
रहने को उनके पास अब घर भी नहीं बचा। करीब दो साल पहले आपदा में पुराने मकान की छत टूट गई। तबसे मकान बगैर छत के है। चारों बच्चे गरीब चाचा आनंद राम के घर में रह रहे हैं। सुनीता खेती, जंगल, गाय का काम कर किसी तरह बच्चों का गुजर-बसर कर रही है, लेकिन रोड से 19 किमी दूर होने से इस इलाके से न दूध बाजार में बेचा जा सकता है और न ही फसल।
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