लोकसभा चुनाव को न उत्साह, न उमंग न ही कोई उम्मीद

Champawat Updated Mon, 05 May 2014 05:31 AM IST
विज्ञापन

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
चूका। भारत-नेपाल की सीमा को बांटने वाली काली के पश्चिमी छोर पर खूबसूरत गांव चूका है। मगर सोना लहलहाने वाली धरती चूका का जीवन सूनापन लिए है। न कोई समृद्धता न विकास की कोई किरण। यहां की जटिलता और संघर्ष को शहर से समझने की चूक ने चूका को पिछड़ेपन की न मिटने वाली पहचान दी है। क्षेत्र के जानकर महेश चौड़ाकोटी, प्रकाश सिंह, ज्ञान सिंह, रघुवीर सिंह और वनरावत चंदन की मदद से अमर उजाला की टीम ठुलीगाड़ से 26 किमी के पैदल सफर पूरा कर यहां पहुंची, तो सीमावर्ती चूका गांव की असल दुनियां की तस्वीर सामने थी। यहां तो आजादी के 67 साल बाद भी विकास का पहला कदम नहीं उठाया जा सका है। सब पढ़े, सब बढ़े के नारे के बावजूद यहां पांचवीं से आगे की पढ़ाई का कोई इंतजाम नहीं। 108 का लाभ लेने के लिए भी 26 किमी पैदल चलना इस गांव की हकीकत है। सरकारी राशन लाने के लिए भी 14 किमी दूर सेलागाड़ जाना पड़ता है। पोलिंग बूथ का मुआयना किया जा चुका है। लेकिन यहां कोई हलचल नहीं है। पान सिंह, भीम, राजेंद्र सिंह और गौरी सिंह को लोकसभा चुनाव होने की जानकारी है। किसी नेता या प्रत्याशी को वे भी नहीं जानते। यहां कोई सांसद कभी पहुंचा नहीं, तो क्या समस्याएं दूर होंगी। ग्रामीणों में न कोई उमंग, न कोई उत्साह और नहीं किसी से कोई उम्मीद बची है। उत्साह हीन इस इलाके में सिर्फ एक आस एसएसबी है। जो संसाधनों की कमी के बीच भी मुस्तैदी से सीमा की हिफाजत कर रही है।
विज्ञापन

कालगूंठ (मां पूर्णागिरि) ग्राम पंचायत के राजस्व गांव चूका से 39 परिवारों में से अब 21 परिवार ही यहां रह गए हैं। लोकसभा चुनाव के लिए पोलिंग बूथ बने चूका प्राइमरी स्कूल में 50 महिलाओं सहित 110 मतदाता 7 मई को वोटिंग करेंगे। लेकिन इस लोकतांत्रिक हक के अलावा यहां शेष सिफर है। ठुलीगाड़ से चूका की पैदल राह कतई आसान नहीं है। लेकिन श्रीकुंड तक का 6 किमी का रास्ता तो चप्पे-चप्पे में इम्तिहान लेता है। काली नदी के किनारे वाले बेहद तंग और खतरों से भरे इस मार्ग में एक पल की चूक भी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। श्रीकुंड, कलढुंगा और चूका में एसएसबी की बीओपी (बार्डर आउटपोस्ट) के अलावा 26 किमी के पैदल सफर में कोई आबादी वाला इलाका नहीं सिर्फ जंगल और रोखड़ है।
शिक्षा के अधिकार का सच चूका आते-आते हांफने लगता है। प्राइमरी से आगे की तालीम गांव के लिए बस सपना है। भीम सिंह बताते हैं कि पांचवीं से आगे की पढ़ाई के लिए 6 बच्चे कोटकेंद्री जाते हैं। पान सिंह कहते हैं कि 108 का लाभ लेने के लिए भी पहले 26 किमी पैदल चलकर ठुलीगाड़ पहुंचना होता है। यहां लगे बिजली के खंभों से किसी के घर का अंधेरा नहीं छंटता। गांव से लेकर स्कूल और एसएसबी की तमाम बीओपी अंधेरे में है। एसएसबी की चौकियों में सोलर पावर प्लांट प्रस्तावित है लेकिन अभी लगा नहीं है। 14 किमी पैदल चलकर सेलागाड़ से सस्ता राशन लाना उनकी मजबूरी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us