रोड की कमी से विकास के छटछपटा रहे गांव

Champawat Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
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चंपावत। किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए वहां सड़कों का जाल होना अनिवार्य है। लेकिन चंपावत जिले में आजादी के साढे़ छह दशक बीतने के बाद भी कई ऐसे गांव हैं जो सड़क की कमी के कारण विकास की मुख्यधारा से अभी तक कोसों दूर हैं। जिले में करीब दस प्रतिशत से अधिक आबादी के साथ ही एक-तिहाई से अधिक भूभाग का क्षेत्रफल अभी भी सड़क सुविधा से वंचित है।
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सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी के मुताबिक जिले में कुल 651 राजस्व गांवों में से 328 गांवों में ही सड़क की सुविधा है। 142 गांवों में रोड मंजूर तो हो गई है, लेकिन वन आपत्तियों के निस्तारण सहित अन्य कारणों के चलते यह अभी पूरी नहीं हो सकी हैं। जिले में 181 ऐसे गांव है जहां अभी तक रोड नहीं है। डांडा-ककनई, बुड़म, खटोली, पचनई आदि ऐसे दूरस्थ गांव हैं, जहां से रोड का फासला 20 से 35 किलोमीटर तक है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद के अध्यक्ष महेश चंद्र चौड़ाकोटी का कहना है कि रोड से फासला विकास की राह का रोड़ा भी है। वह कहते हैं कि सड़क की कमी के कारण सूखीढांग क्षेत्र के अधिकतर गांव विकास की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं।
उपेक्षित विकास महासंघ एवं संघर्ष समिति के संयोजक शंकर दत्त जोशी कहते हैं कि रोड की कमी से मरीजों को कंधे पर लाने की मजबूरी तो है ही, साथ ही यहां होने वाले विभिन्न उत्पादों का काश्तकारों को नाममात्र दाम भी नहीं मिलता। काश्तकारों की सारी मेहनत अपने उत्पादों को सड़क तक लाने में लग जाती है। तल्लापाल विलौन संघर्ष समिति की संयोजक एवं पूर्व प्रधान हेमा कनवाल का कहना है कि गांवों में सड़क सुविधा का अभाव लोगों को पलायन के लिए मजबूर कर रहा है। इन गांवों के लोगों को ब्लाक मुख्यालय पहुंचने के लिए 65 से 97 किमी तक का फासला लांघना पड़ता है। जाहिर है ऐसे में लोगों का सुविधाओं की तलाश में पलायन करना एकमात्र विकल्प रह जाता है।
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