अब वर्ष में दो बार होगी फूलों की खेती

Champawat Updated Sun, 12 Aug 2012 12:00 PM IST
चंपावत। सूबे में परंपरागत खेती के स्थान पर फूलों की खेती को महत्व देने वाले काश्तकारों के लिए खुशखबरी है। अब वह संरक्षित विधि से वर्ष में दो बार फूलों की खेती कर अधिक आर्थिक लाभ अर्जित कर सकेंगे। अभी तक सूबे में एक वर्ष में फूलों की केवल एक ही फसल तैयार होती थी। जिसका समय फरवरी से जून तक होता था। लेकिन अब संरक्षित विधि से फूलों की दूसरी खेती जुलाई से अक्तूबर तक की जा सकेगी। गोविंदबल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के वैज्ञानिक डा.प्रकाश फोंदणी के अनुसार संरक्षित विधि से फूलों की खेती के लिए किसानों का चयन किया गया है, जो पर्वतीय क्षेत्र में पहली बार जुलाई से अक्तूबर तक फूलों का उत्पादन करेंगे।
बताते चलें कि सूबे के अन्य जिलों की तुलना में चंपावत जिले में सिंचाई सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में परंपरागत खेती के स्थान पर फूलों की खेती काश्तकारों की आर्थिक उन्नति एवं रोजगार दिशा में मिसाल साबित हो रही है। गोविंदबल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा, स्वयंसेवी संस्था संबंध, वायफ एवं हिमालय सामाजिक एवं पर्यावरण विकास समिति आदि संस्थाओं के प्रयास से चंपावत जिले में पांच सौ से अधिक किसान बंजर एवं अनुपयोगी भूमि में ग्लाईडोलिया एवं लीलियम प्रजाति के फूलों की खेती कर रहे हैं। गोविंदबल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के परियोजना वैज्ञानिक डा.प्रकाश फोंदणी का कहना है कि सूबे में सर्वप्रथम 2007 में नाइप परियोजना के सहयोग से काश्तकारों को फूलों की खेती के लिए प्रेरित किया गया था। जिसके बाद से चंपावत जिला राज्य के अन्य जिलों की तुलना में सर्वाधिक फूलों का उत्पादन करने लगा है।
स्वयंसेवी संबंध संस्था के निदेशक जीवन जोशी के अनुसार संस्थान ने नाबार्ड की वित्त पोषित परियोजना के अंतर्गत फूलों की खेती के लिए प्रतिवर्ष किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। उत्पादित फूलों के बाजारीकरण के लिए स्थानीय व्यापारियों के साथ अनुबंध करने के साथ ही फ्लावर कलेक्शन सेंटर की स्थापना भी की गई है। जहां से किसानों के फूलों को उचित मूल्य में खरीदकर दिल्ली, मुंबई सहित अन्य महानगरों को भेजा जा रहा है।

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