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अब नहीं दिखती सामूहिक श्रमदान की परंपरा ‘पड़म’

Champawat Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
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चंपावत। ग्रामीण जीवन में प्रेम भाव को जगाने तथा सामाजिकता की अनूठी मिसाल समझी जाने वाली पड़म (मिल जुलकर एक दूसरे का कार्य पूरा करने) की परंपरा अब विलुप्त होने लगी है।
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दूरदराज के ग्रामीण परिवेश में विभिन्न काम-धंधों के साथ ही सुख-दुख के समय एक दूसरे का हाथ बंटाने में सहयोग करने की यह परंपरा अब यदा-कदा ही दिखाई देती है। इतिहास लेखन के शोध कार्य में लगे देवेंद्र ओली का कहना है कि पूर्व में जहां गांवों में मकान बनाने से लेकर खेती के कार्यों को आसानी से पूरा करने के लिए पड़म परंपरा बेहद मददगार थी। गांव के सभी लोग मिलजुल कर एक व्यक्ति अथवा परिवार की बेहतरी के लिए श्रमदान किया करते थे। लेकिन अब पर्वतीय समाज में पड़म की गौरवशाली परंपरा लुप्त होने का असर यहां के सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ रहा है।
पूर्व प्रधानाचार्य केसी लोहनी के अनुसार अतीत में ग्राम्य जीवन में आदर्श समाज की स्थापना के लिए पड़म परंपरा बेहद कामयाब थी। जिसके तहत गांव में फसल समेटने से लेकर मकान आदि के निर्माण कार्य के दौरान शारीरिक रूप से अक्षम अथवा कमजोर माली हालात वाले परिवारों की सभी लोग मिलकर सहायता करते थे। जिससे आपसी एकता मजबूत होती थी तथा श्रमदान की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता था। लेकिन वर्तमान में सामूहिक श्रमदान की गौरवशाली परंपरा धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है, जो चिंता का विषय है।

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