...अब नहीं होती पशु बलि

Champawat Updated Sun, 03 Jun 2012 12:00 PM IST
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टनकपुर। मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ में पशु बलि अब अतीत बन गई है। कभी पशु बलि के लिए पहचाने जाने वाले इस शक्तिपीठ में अब पशु बलि नहीं होती है। दो सालों से यहां प्रतीकात्मक बलि की परंपरा शुरू हो गई है। ऐसा किसी संस्था की पहल पर नहीं बल्कि दो वर्ष पूर्व यहां तैनात तत्कालीन मेला मजिस्ट्रेट एसडीएम जगदीश चंद्र कांडपाल की पहल पर संभव हुआ है।
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धार्मिक स्थलों में आस्था के चलते निरीह पशुओं की बलि की परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में सुमार चंपावत जिले में स्थित सुविख्यात पूर्णागिरि धाम में भी पशु बलि की परंपरा थी। मुराद पूरी होने पर श्रद्धालु पूजा-अर्चना के बाद पशु बलि देते थे। मुख्य मंदिर से करीब 400 मीटर की दूरी पर मां काली के मंदिर में पशु बलि देने की परंपरा थी, लेकिन 2010 से पूर्णागिरि धाम में पशु बलि की परंपरा खत्म हो गई है। तत्कालीन मेला मजिस्ट्रेट एसडीएम जगदीश चंद्र कांडपाल ने 2010 में पशु बलि समाप्त किए जाने की पहल की और इसके लिए वे पुजारियों को सहमत करने में भी सफल रहे। हालांकि शुरुआत में पशु बलि रोकने में दिक्कतें आईं, मगर अंतत: पशु बलि थम गई। पशु बलि के स्थान पर अब प्रतीकात्मक बलि की परंपरा शुरू हुई है। मुराद पूरी होने पर बलि के लिए पशु लेकर आने वाले श्रद्धालु काली मंदिर में पशु के बाल चढ़ाकर बलि की रस्म अदा करने लगे हैं। मंदिर कमेटी अध्यक्ष किशन तिवारी का कहना है कि पशु लेकर आने वाले भक्तों को समझा-बुझाकर पशु बलि से रोका जा रहा है।
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