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जड़ी-बूटी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेस ने बनाई पहचान

Chamoli Updated Fri, 07 Nov 2014 05:30 AM IST
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देवाल। चमोली जिले का दूरस्थ गांव घेस जहां पहले असुविधाओं के जाना जाता था उसी गांव ने आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जड़ी-बूटी की खेती कर अपनी अलग पहचान बना ली है। पारंपरिक खेती को छोड़कर किसान जड़ी-बूटी की खेती कर करोड़ों रुपये का कारोबार प्रतिवर्ष कर रहे हैं। इस वर्ष ही कूट और कुटकी की फसल को 15 से 20 लाख रुपये में डाबर कंपनी और व्यापारियों को बेचा है।
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मुख्यालय से 30 किमी दूरी पर बसे घेस गांव के किसानों ने वर्ष 2001 में कुटकी की खेती कर पारंपरिक खेती को बदलने की शुरुआत की। पहले चरण में केवल 8 किसानों ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली जड़ी-बूटी कुटकी का अपनी 10 नाली भूमि में उत्पादन शुरू किया था। लाभ को देखते हुए आज गांव के 86 किसान अपनी 100 से अधिक नाली भूमि में इस जड़ी-बूटी की खेती कर रहे हैं। किसान दिवान सिंह, दयाल सिंह, खिलाफ सिंह, अर्जुन सिंह आदि का कहना है कि जड़ी-बूटी की खेती से जुड़ा किसान एक वर्ष में एक लाख से अधिक की आय अर्जित कर रहा है। ग्रामीणों से जड़ी-बूटी खरीदने के लिए दिल्ली की धवन इंटरनेशनल कंपनी और जर्मनी की मार्टिन पेंटीज कंपनी के साथ वर्ष 2005 में व्यापारिक समझौता हुआ था, जिसके तहत खरीदार कंपनियां गांव में आकर किसानों से जड़ी-बूटी खरीदते हैं। केशर सिंह ने बताया कि अक्तूबर से कूट और कुटकी की फसलें निकाली जा रही हैं, जो नवंबर के अंतिम माह तक निकाली जाएंगी। यह फसल गांव में स्टोर की जाती है। पूरी फसल निकालने पर अनुबंधित व्यापारियों को जड़ी-बूटी बेची जाएगी।

कुटकी से शुरू सफर जटामासी तक पहुंचा
वर्ष 2001 में शुरू हुई कुटकी की खेती, अतीश, कूट, तगर, चोरू से होते हुए वर्ष 2013 में जटामासी के उत्पादन तक पहुंच गई है। गांव के केशर सिंह, हरक सिंह और शेर सिंह एक वर्ष से करीब तीन नाली भूमि पर जटामासी की फसल तैयार कर रहे हैं, जिससे किसानों की आर्थिकी और मजबूत होगी।

घर ही में 1200 रुपये किलो बिक रही कुटकी
घेस गांव की कुटकी से किसानों को 900 से 1200 रुपये प्रति किलोग्राम की आय हो रही है, जबकि कूट 150-250, अतीश 500, तगर 250 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। जड़ी-बूटी का विपणन गांव में ही हो रहा है। किसानों की मेहनत को देखते हुए जड़ी-बूटी शोध संस्थान ने पांच किसानों को सम्मानित करते हुए 2-2 लाख की प्रोत्साहन राशि भी दी। इस खेती का समय-समय पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

जड़ी-बूटी उपयोग
कुटकी खून साफ करना, ताकत, ज्वर और शुगर की दवा के रूप में
कूट सांस रोग की दवा में
चोरू गैस, पाचन की दवाओं सहित गरम मसाला बनाने में।
जटामासी अनिंद्रा, गर्मी और तनाव दूर करने की दवा बनाने में।
अतीश उल्टी, दस्त, पेट दर्द आदि के लिए।
तगर उदर विकार संबंधी दवाओं के निर्माण।

वर्ष 2001 से जड़ी-बूटी का उत्पादन हो रहा है। गांव के 86 कृषक जड़ी-बूटी का उत्पादन कर रहे हैं, जिसका टर्नओवर एक करोड़ से अधिक पहुंच गया है। तीन वर्ष से किसान जटामासी का उत्पादन कर रहे हैं, जिसकी फसल जल्द तैयार होगी। यदि यहां प्रोसेसिंग यूनिट लग जाती तो कृषकों को अधिक लाभ मिलता। - केशर सिंह बिष्ट कृषक घेस गांव।
राज्य में घेस गांव ही ऐसा है जिसने पारंपरिक खेती छोड़कर जड़ी-बूटी को अपनाया है। संस्थान और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की ओर से कृषकों को समय-समय पर प्रोत्साहन दिया जाता है। कूट और कुटकी की यहां बड़े पैमाने पर खेती की जा रही है। - हयात राम आर्य निदेशक जड़ी-बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर चमोली।
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