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भूल गए बाबा मोहन उत्तराखंडी की शहादत

Chamoli Updated Thu, 08 Aug 2013 05:35 AM IST
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कर्णप्रयाग। हमने जिस शिद्दत से एक लौ जलाई थी। सोचा था हम रहे न रहे, लेकिन ये जलती रही... ये पंक्ति बाबा मोहन उत्तराखंडी के संघर्षों को बयां करती है। लेकिन आज इन पंक्तियों के मायने जनप्रतिनिधि और सरकारों के लिए धुमिल सी हो गई हैं। बाबा के बलिदान को आज नौ साल हो गए हैं, लेकिन आज तक हमारी नई पीढ़ी उक्त आंदोलनकारी के संघर्ष की गाथा से अंजान है।
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राज्य निर्माण के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी ने वर्ष 1997 से आमरण अनशन से संघर्ष शुरू किया। 13 बार उन्होंने आमरण अनशन कर उन्होंने पहाड़ को एक करने में भी अहम भूमिका निभाई। वहीं शासन/प्रशासन (केंद्र व यूपी सरकारों) को उत्तराखंड निर्माण के बार-बार सोचने पर मजबूर किया। सरकारी नौकरी के साथ घर, परिवार को छोड़कर उन्होंने पहाड़ में आंदोलन की एक नई रूपरेखा रची। नवंबर 2000 को उत्तराखंड देश के नक्शे में नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, लेकिन गैरसैंण राजधानी का सपना साकार होना अब भी शेष था। उन्होंने अपना आखिरी आमरण अनशन बेनीताल में 2 जुलाई 2004 को शुरू किया। 37वें दिन 8 अगस्त को उन्हें कर्णप्रयाग तहसील प्रशासन द्वारा जबरन उठाकर सीएचसी में भर्ती किया गया, जहां उन्होंने रात्रि को दम तोड़ दिया था।

जीवन परिचय
बाबा मोहन उत्तराखंडी का जन्म वर्ष 1948 में हुआ। पौड़ी जिले के एकेश्वर ब्लाक के बठोली गांव में मनवर सिंह नेगी के तीन बेटों में मझले मोहन इंटरमीडिएट एवं आईटीआई की पढ़ाई के बाद वर्ष 1970 में बंगाल इंजीनियरिंग में भर्ती हुए, लेकिन उनका सेना में मन नहीं लगा। वर्ष 1994 में नौकरी छोड़ वे राज्य आंदोलन में कूद गए। 2 अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहे में हुई घटना से उन्होंने आजीवन बाल, दाड़ी न काटने की शपथ ली। 11 जुलाई 1997 को राज्य व राजधानी गैरसैंण के लिए शुरू अनशन का सफर 8 अगस्त 2004 की रात्रि को मौत के साथ ही थमा।

बाबा मोहन उत्तराखंडी के आंदोलन
11 जनवरी 1997 को लैंसीडाउन के देवीधार में राज्य निर्माण के लिए अनशन।
16 अगस्त 1997 से 12 दिन तक सतपुली के समीप माता सती मंदिर में अनशन।
1 अगस्त 1998 से 10 दिन तक गुमखाल पौड़ी में अनशन।
9 फरवरी से 5 मार्च 2001 तक नंदाठौंक गैरसैंण में अनशन।
2 जुलाई से 4 अगस्त 2001 तक नंदाठौंक गैरसैंण में राजधानी के लिए अनशन।
31 अगस्त 2001 को पौड़ी बचाओ आंदोलन के लिए अनशन।
13 दिसंबर 2002 से फरवरी 2003 तक चॉदकोट गढ़ी पौड़ी में गैरसैंण राजधानी के लिए अनशन।
2 अगस्त से 23 अगस्त 2003 तक कौनपुर गढ़ी थराली में अनशन।
2 फरवरी से 21 फरवरी 2004 तक कोदियाबगड़ गैरसैंण में अनशन।
2 जुलाई से 8 अगस्त 2004 तक बेनीताल में अनशन।
आखिकार 9 अगस्त 2004 को रास्ते में ही मौत।

राज्य निर्माण, गैरसैंण राजधानी की मांग को लेकर बाबा मोहन उत्तराखंडी के संघर्ष को शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। नई पीढ़ी को अपने आंदोलनकारियों के बारे में जानकारी हो, इसके लिए ठोस प्रयास होने चाहिए। हमें उत्तराखंड मिला जरूर, लेकिन जन भावनाएं आज भी उपेक्षित हैं। गैरसैंण सिर्फ राजनीति का केंद्र बनकर रह गया है। सरकारें बाबा के बलिदान को भूल गई हैं।
- बीरेंद्र मिगंवाल, अध्यक्ष शहीद बाबा मोहन उत्तराखंडी मेला स्मृति समिति बेनीताल

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