कौन सुनेगा इन गांवों का दर्दv

Chamoli Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
केस संख्या 1 : नारायणबगड़ ब्लाक के गड़नी क्षेत्र की 10 ग्राम पंचायतें, श्रीगुरु पट्टी की आठ ग्राम पंचायतों सहित कफारतीर, कोट, भटियाणा ग्राम पंचायतों के ग्रामीण सड़क के अभाव में 10 से 15 किमी पैदल जा रहे हैं। दूरस्थ क्षएत्र की झिझोंणी ग्राम पंचायत के प्रधान सोवन लाल कहते हैं कि चुनाव बहिष्कार की चेतावनी से भी राजनेताओं और अधिकारियों के कानों पर जूं नहीं रेंगी। लाचार ग्रामीण सड़क की आस में नारायणबगड़ से 15 किमी की पैदल दूरी नापने को विवश हैं।
केस संख्या 2 :
कर्णप्रयाग विकासखंड का बरसाली, सिलंगी, घाघू, मौंणा, नाकोट गांव वर्ष 2009 से बरसाली-सिलंगी पेयजल योजना के निर्माण की आस लगाए हैं। लेकिन योजना इंचभर भी नहीं बन पाई। धनसारी एवं थापली गांव भी पानी के अभाव में पलायन से खाली हो गया है। स्थानीय हरीश चौहान, राकेश थपलियाल और वीपी थपलियाल कहते हैं कि सरकारी तंत्र की उपेक्षा ने गांवों को प्यासा छोड़ दिया है।
केस तीन :
गैरसैंण क्षेत्र के सिलपाटा, प्यूंरा, पज्याणा, लंगटाई गांवों में आज भी बीमार एवं गर्भवती महिलाओं को दंडी पर बिठाकर तीस किमी दूर कर्णप्रयाग या गैरसैंण ले जाना पड़ता है। वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव बहिष्कार के बावजूद इन गांवों को स्वास्थ्य, संचार, सड़क की सुविधा नहीं मिल पाई है।
कर्णप्रयाग। मूलभूत सुविधाओं को तरसते गांवों के दर्द को जानने का प्रयास यूपी के दौर में हुआ न उत्तराखंड राज्य के 12 सालों में। भले ही घोषणाएं खूब हुईं, आश्वासन की धूप भी खिली लेकिन हकीकत की फसल धरातल पर नहीं उग पाई। कर्णप्रयाग, पिंडरघाटी एवं गैरसैंण के दर्जनों गांव आज भी सड़क, शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य, विद्युत जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए शासन, प्रशासन एवं विभागों की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। पथराई आंखों को मिला तो लंबा इंतजार। कर्णप्रयाग का स्वर्का, सुखतोली और आदिबदी क्षेत्र के थापली गांव वीरान हो चुके हैं। डेढ़ दशक पूर्व इन गांवों में 40 से 50 परिवार निवास करते थे। आज सिर्फ 6 से 8 परिवार ही रह रहे हैं। स्वर्का निवासी राम प्रसाद मैखुरी और थापली निवासी वीपी थपलियाल का कहना है कि आजादी के छह दशक बाद भी गांवों का सड़क से नहीं जुड़ना गांवों के प्रति राजनेताओं की संवेनहीनता को बयां करता है।
इनका कहना है--
गांवों को मूलभूत सुविधाओं से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। शासनस्तर पर सभी विभागों से ऐसे गांवों की सूची मांगी जा रही है। प्रदेश सरकार आम आदमी के विकास के प्रति कृत संकल्प है।
-- डा. अनसूया प्रसाद मैखुरी विधायक कर्णप्रयाग
राजनीतिक स्तर पर गांवों के विकास के बारे में आज तक सोचा ही नहीं गया है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है लेकिन आज भी यहां कृषक की हालत सबसे दयनीय है। गांवों को हाईटेक बनाने की बातें और दावे तो खूब किए गए लेकिन उत्तराखंड राज्य के 12 सालों में भी दर्जनों गांव जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं।
- इंद्रेश मैखुरी, प्रदेश उपाध्यक्ष किसान महासभा

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