सिलेंडर मिल जाता कुछ बना लेते साहब!

Chamoli Updated Tue, 18 Sep 2012 12:00 PM IST
ऊखीमठ। साहब घर तो तबाह हो गया, रसोई का सामान भी बह गया। आखिर कितने दिनों तक हम शरणार्थियों की तरह स्कूल में पड़े रहेंगे। हमें एक सिलेंडर मिल जाता, तो किसी दूसरे सुरक्षित स्थान पर शरण लेकर रूखा-सूखा बना लेते।
आंखों में आंसू लिए कुछ ऐसी ही पीड़ा आपदा प्रभावित मंगल सिंह ने डीएम के सामने बयां की। प्रभावित क्षेत्र के लोग किस तरह चारों ओर फैले मलबे, दुख और अपनों को खोने के गम के बीच भी जिंदा हैं, हमें भी उनके दुख, दर्द और भूख का अहसास था। रिपोर्टिंग के दौरान सिर्फ एक समय का खाना न मिलने के कारण प्रभावित क्षेत्र में भटकते हुए हम अच्छी तरह उनके दर्द को महसूस कर रहे थे।
रोते-बिलखते बच्चों के लिए मां दूध कहां से लाए, जैसे-तैसे शिविर में दो वक्त का निवाला मिल रहा है। तबाही से हालात इस कदर बदहाल हो चुके हैं लोग पूरी तरह से असहाय हो चुके हैं। मौत के सैलाब में ज्यादातर मवेशी भी आपदा की भेंट चढ़ गए हैं, जो बचे हैं वह इधर-उधर भटक रहे हैं। राहत शिविर में 60-70 लोग ऐसे भी हैं, जो दिन में अपने घर जा रहे हैं और रात को शिविर में लौट रहे हैं। आपदा ने प्रभावितों से उनके सगे संबंधियों तो छीन ही लिए, साथ ही भविष्य को भी संकट में डाल दिया है।

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