कैलुवा विनयाक में वरदान देते गणेश

Chamoli Updated Fri, 31 Aug 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। हिमालय की सांस्कृतिक विरासत श्री नंदा देवी राजजात से जुड़े प्रत्येक गांव एवं पड़ावों का अपना विशेष महत्व है। मां नंदा से जुड़े ये धार्मिक स्थल कई ऐतिहासिक एवं धार्मिक गाथाओं को संजोए हैं। इन्हीं में निर्जन स्थल कैलुवा विनायक भी है। इस दुर्गम एवं बुग्याली क्षेत्र की चोटी पर भगवान गणेश की काले पत्थर पर उकेरी गई मूर्ति राजजात में भक्तों के आकर्षण का केंद्र है।
श्री नंदा राजजात में वांण गांव अंतिम बस्ती क्षेत्र है। यहां से निर्जन पड़ाव शुरू हो जाते हैं। रणकधार, नीलगंगा, गैरोली पातल, डोलियाधार, ऑली एवं वैदनी कुंड, पातरनौचड़िया से चार किमी खड़ी चढ़ाई के बाद कैलुवा विनायक पहुंचा जाता है। इस स्थान पर बुग्यालों की चोटी पर भगवान गणेश की प्राचीन मूर्ति है। काले पत्थर पर उकेरी गई यह मूर्ति देवी भक्तों के आकर्षण का केंद्र बनती है। मान्यता है कि राजजात के निर्वघ्न पूरा होने की कामना के लिए ही भगवान गणेश की मूर्ति यहां स्थापित की गई। दूसरी तरफ बुर्जगों के अनुसार बुग्याली क्षेत्रों मे प्राचीन काल में पशुचारक विनायक स्थापित करते थे, जिन्हें रास्तों के पहचान रूप में माना जाता था।


कैलुवा विनायक में होती गणेश की पूजा
भगवान गणेश को शिव और पार्वती के द्वारपाल के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि राजजात में गणेश की अनुमति से ही कैलुवा विनायक से यात्रा हिमालय क्षेत्र की ओर प्रस्थान करती है। इसलिए इस स्थान पर राजजात में गणेश की विशेष पूजा की जाती है। उन्हें घी का लेपन एवं सिंदुर का टीका लगाकर भोग के रूप में गुड़ चढ़ाया जाता है।

इनका कहना है--
कैलुवा विनायक में राजजात के निर्वघ्न पूरा होने के लिए गणेश की पूजा की जाती है। यहां पर स्थापित मूर्ति आठवीं सदी की है। इस स्थान से गणाधिपति स्वयं राजजात यात्रा के पथ प्रदर्शक की भूमिका भी निभाते हैं। - पं. हरिदत्त कुनियाल निवासी देवाल

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