राजजात आस्था और परंपराओं का संगम

Chamoli Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। मां श्रीनंदा की राजजात गढ़वाल-कुमाऊं में भक्ति, आस्था और श्रद्धा के उमड़ते सैलाब के साथ ही यहां के पारंपरिक रीति-रिवाजों और परंपराओं के निर्वहन का प्रतीक भी है। राजजात के समय गांवों में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा जागर और अन्य गीतों सेें मां नंदा का आह्वान कर अपने आराध्य के प्रति प्रेम उजागर करता है।
हर बारह वर्ष या उससे अधिक समय में आयोजित होने वाली श्रीनंदा राजजात को आस्था और परंपराओं का संगम माना जाता है। 19 पड़ावों वाली इस धार्मिक पैदल यात्रा में प्रत्येक पड़ाव अपना सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व लिए हुए है। वहीं पड़ावों के दौरान पड़ने वाले गांवों में जिस अंदाज से ग्रामीणों द्वारा अपनी ईष्ट देवी का उल्लास से स्वागत किया जाता है, वह अलौकिक एवं अतुलनीय है।
पिछली राजजात में शामिल कई लोगों के अनुसार गांवों में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा जागर, झोड़ा और चांछरी में देवी की महिमा के गायन के साथ राजजात का भव्य स्वागत किया गया था। जनपद के कुरुड़, बधाण, लाता, नीति, मलारी सहित अन्य स्थानों में महिलाओं और पुरुषों के साथ ही जागर गायकों द्वारा जागरों एवं नृत्यों के माध्यम से मां नंदा देवी की उत्पत्ति से लेकर उसके ससुराल (कैलाश) विदाई तक का मार्मिक वर्णन किया जाता है।

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