यहां अब भी नई-नई सी है ‘आजादी’

Chamoli Updated Fri, 17 Aug 2012 12:00 PM IST
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गोपेश्वर। अद्भुत! 15 अगस्त की सुबह नीती घाटी के बांपा गांव में आंख खुली तो बस यही शब्द मुंह से निकला। चीन की सीमा से लगते इस सीमांत क्षेत्र में स्वतंत्रता दिवस की सुबह देशप्रेम का एक अलग ही मतलब समझ में आया। भारतीय होने पर घाटी के लोगों का गर्व सुखद अहसास से भर देने वाला रहा। इस घाटी के लोगों के लिए न तो आजादी का दिन पुराना हुआ है, न उसका उल्लास। वाकई, यहां मौजूद हर शख्स कि हर धड़कन कह रही थी जय हिंद!
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आजादी के बाद से ही नीती घाटी में स्वतंत्रता दिवस एक पर्व की तरह मनाया जाता है। इस पर्व को करीब से देखने के लिए अमर उजाला की टीम मंगलवार शाम ही बांपा गांव में पहुंच गई थी। सुबह चार बजे भाणे-भंकोरों की मधुर आवाज के साथ अचानक आंख खुली। बाहर निकलकर देखा तो चारों ओर तिरंगा ही तिरंगा नजर आ रहा था। जय हिंद के नारे लग रहे थे, घरों की छतों पर लगे लाउडस्पीकर से देशभक्ति के गाने बज रहे थे। कई लोग ऐसे भी नजर आए जो गलियों में स्वतंत्रता दिवस का जश्न उसी अंदाज में मना रहे थे, जैसा कि क्रिकेट में पाकिस्तान को हराने के बाद मनाया जाता है। यह नजारा देखते-देखते सुबह के आठ बज गए। परंपरा के अनुसार लोगों ने फैला पंचनाग मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद सार्वजनिक चौक पर झंडारोहण किया। यहां मौजूद हर शख्स की आंखों में भारतीय होने का गर्व झलक रहा था।
इसके बाद हम गमसाली गांव होते हुए नीति गांव पहुंचे। नीती गांव देश का अंतिम गांव है और यहां से आगे चीन की सीमा शुरू होती है। गमसाली में सुबह साढ़े नौ बजे और नीती गांव में साढे़ दस बजे देशभक्ति के नारों के बीच झंडारोहण किया गया। यहां से हमारी टीम 12.30 बजे मुख्य समारोह स्थल दंपू धार में पहुंची। कुछ ही देर बाद दूर से एक गाने की आवाज आती सुनाई दी। आवाज कुछ साफ हुई तो समझ में आया कि यह फरकिया के ग्रामीणों की टोली थी। गाना था ‘ऐ मेरे वतन केलोगों जरा आंख में भर लो पानी...’। टोली में छोटे-छोटे बच्चों से लेकर महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे। हर हाथ में तिरंगा और जुबां पर देशभक्ति के नारे। कुछ इसी अंदाज में नीति, बांपा, महरगांव, गमशाली और कैलाशपुर के ग्रामीणों की झांकियों ने भी दिल को छू लिया।
समारोह स्थल पर 98 वर्षीय धूम सिंह पाल ने 15 अगस्त 1947 की यादों का ताजा किया। उन्होंने बताया कि जब रेडियो पर देश आजादी की खबर सुनी तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस दौरान नीती घाटी से तिब्बत (चीन) में ऊन का व्यापार होता था। उस दिन चीन से व्यापार कर वापस आ रहे लोग आजादी के नारे लगाते हुए लौटे। घाटी में जश्न का माहौल बन गया था, तब से लेकर आज तक हम इस दिन को त्योहार के रूप में मनाते आ रहे हैं। उनकी बाते सुनते-सुनते वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं।
इसके बाद शुरू हुआ मुख्य समारोह। मुख्य अतिथि प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत ने ध्वजारोहण किया। राष्ट्रगान के बाद मिठाइयां बांटी गईं और पौधे रोपे गए। नीति घाटी के सातों गांवों से आई महिलाओं ने पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत कर जश्न-ए-आजादी में चार चांद लगा दिए। इस मौके पर बदरीनाथ के पूर्व विधायक केदार सिंह फोनिया, नीति घाटी के सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रमोहन फोनिया, क्षेत्र पंचायत सदस्य गमसाली ललित सिंह पाल, प्रधान महर गांव गुड्डी देवी, महेशी देवी के साथ ही आईटीबीपी के अधिकारी भी मौजूद थे।

यहां तिरंगे के लिए होते हैं जमा होते हैं पैसे
गोपेश्वर। नीती घाटी में एक अनूठी परंपरा देशी आजादी के समय से ही चली आ रही है। घाटी के छह गावों के लोग स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने के लिए तिरंगे के लिए भेंट के रूप में धन इकटठा करते हैं। इस बार भी हजारों रुपये जमा किए गए। जमा किए गए इस धन से लोगों को मिठाइयां बांटी जाती है।

द्वितीय रक्षा पंक्ति के गांव
गोपेश्वर। चीन सीमा पर लगे नीती घाटी के गांवों को देश की द्वितीय रक्षा पंक्ति के गांवों के नाम से भी जाना जाता है। यहां के ग्रामीण सीमा पर भारतीय सेना की मदद के लिए हर समय तत्पर रहते हैं। यहां सेना और ग्रामीण आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं। बता दें कि अभी तक चीन द्वारा जितनी बार भी भारतीय सीमा पर घुसपैठ की। इसकी जानकारी भारतीय सेना को इन गांवों के पालसियों (बकरी चराने वाले) ने ही दी।
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