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सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक नंदा राजजात

Chamoli Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
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कर्णप्रयाग। हिमालय की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक श्रींनंदा राजजात को वर्ष 2000 में गढ़वाल एवं कुमाऊं की सांस्कृतिक एवं धार्मिक संस्कृति को एकजुट करने का श्रेय भी प्राप्त है। मां श्रीनंदा की इस ऐतिहासिक एवं भव्य पैदल यात्रा ने गढ़-कुमाऊं के बीच 75 वर्ष बाद धार्मिक एवं संस्कृति का नया अध्याय खोलते हुए सामाजिक रूप से भी एकजुट किया।
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मान्यताओं के अनुसार सातवी शताब्दी से गढ़वाल एवं कुमाऊं के राजाओं ने नंदा की विशेष पूजा-अर्चना के साथ प्रत्येक बारह वर्ष में राजयात्रा कराने की शुरूआत की थी। गढ़वाल के राजा ने अपनी राजधानी देवलगढ़ स्थापित कर राजजात की जिम्मेदारी कुंवर को सौंपी। जिसका निर्वहन कुंवर जाति के लोग आज भी कर रहे हैं। लेकिन कुमाऊं में वर्ष 1925 के बाद राजजात में शामिल होने की परंपरा में ठहराव आ गया। इतिहासकारों के अनुसार कुमाऊं के राजा आनंद सिंह की मृत्यु के बाद उनका वंशज न होने से वर्ष 1951, 1968, 1987 की श्रीनंदा राजजात में कुमाऊं की भागीदारी नहीं हो पाई। स्थिति यह रही राजशाही की शाखा काशीपुर भी नंदाष्टमी पर्व तक सीमित होकर रह गई। लेकिन वर्ष 2000 में नंदा राजजात ने गढ़-कुमाऊं के बीच 75 वर्षों से बंद धार्मिक एवं सामाजिक संस्कृति के अध्याय पुन: खोलने में सफलता पाई।

गायकों को मिलता था मेहनताना
कुमाऊं के राजा आनंद सिंह अविवाहित थे। उन्हें उस दौर में देशभर में अध्यात्म एवं तांत्रिक शक्तियों का ज्ञानी माना जाता था। उन्होंने राजजात में कुमाऊं से नंदा की छंतोली के साथ आने वाले मां नंदा के जागर गायकों मेहनताना तय कर रखा था। भोग-विलासिता से दूर रहने वाले राजा के अंतिम समय तक उनके साथी स्व. कालीचरण पंत साथ रहे।

कोट माई से कटार होती शामिल
राजजात में पूर्वकाल से ही कुमाऊं के कोट माई से मां श्रीनंदा की कटार विशेष तौर पर शामिल होती है, जिसका मिलन जनपद चमोली के नंदकेशरी (देवाल) में शामिल होती है। वहीं अन्य स्थानों से देवी की छंतोली भी राजजात में भाग लेती हैं।

इनका कहना है--
कुमाऊं के राजा आनंद सिंह की मृत्यु के बाद कुमाऊं से राजजात में भागीदारी 75 साल तक नहीं हो पाई। वर्ष 2000 में दोनों तरफ से हुए प्रयासों के बाद इस परंपरा को पुन: शुरू किया गया। वर्ष 2013 में होने वाली श्रीनंदा राजजात में कुमाऊं के कई स्थानों से देवी की छंतोलियां एवं निशान भी भाग लेंगे। - प्रो. एमपी जोशी सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष इतिहास कुमाऊं विवि अल्मोड़ा

वर्ष 2000 में हुई राजजात में कुमाऊं की भागीदारी ने राजजात की भव्यता को एक नया रूप है। प्रो. देव सिंह पोखरिया की पुस्तक नंदा जागर में मां नंदा के मायके से ससुराल जाने के स्थानों का वर्णन मिलता है। जागर इस बात का प्रमाण है कि गढ़वाल एवं कुमाऊं के रास्तों से मां नंदा की राजजात हुई है। - प्रो. डीआर पुरोहित पूर्व निदेशक लोक संस्कृति एवं कला निष्पादन केंद्र केविवि श्रीनगर गढ़वाल

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