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पुडियाणी गांव में महिलाओं ने स्वयं तैयार किया जंगल

Dehradun Bureauदेहरादून ब्यूरो Updated Mon, 15 Apr 2019 10:02 PM IST
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कर्णप्रयाग। लकड़ी, चारा-पत्ती और पानी की समस्या से निजात पाने के लिए 39 साल पहले शुरू की गई पुडियाणी गांव की महिलाओं की मेहनत रंग लाई है। महिलाओं ने स्वयं के प्रयासों से गांव में बांज, बुरांश, काफल समेत कई पौधे लगाए थे जहां अब विशाल जंगल बन गया है। इस जंगल से आज गांव के पेयजल स्रोत रिचार्ज हो रहे हैं तो महिलाएं यहीं से अपनी जरूरतें पूरा करती हैं। जंगल की सुरक्षा के लिए समिति बनाकर अध्यक्ष और वन रक्षक भी रखा गया है।
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कर्णप्रयाग शहर से 20 किमी दूर नौटी मोटर मार्ग पर करीब 210 परिवारों वाला पुडियाणी गांव है। 39 साल पहले इस गांव में पानी की भारी किल्लत थी। गांव के लोग कुएं के अलावा अन्य दूसरे गांवों से पानी लाकर पीते थे। ऊंचाई वाला क्षेत्र होने के कारण जलावनी लकड़ी और पशुओं के लिए चारा पत्ती की भी भारी कमी थी। इन सब समस्याओं से निजात पाने के लिए गांव की महिलाओं ने एक समूह बनाया। योजनाबद्ध तरीके से गांव के पास बांज, फनियाट, बुरांश, काफल, कटकटी, अंग्याल के 400 पौधों को रोपा गया। गांव में पानी की भारी कमी थी, लिहाजा महिलाओं ने पीने के पानी से पौधों को सींचने के लिए पानी दिया। आज इसी का परिणाम है कि पुडियाणी गांव के छह वर्ग किमी में फैले इस जंगल में 450 से अधिक प्रजाति के करीब 10 लाख पेड़ हैं। गांव के लोग बताते हैं कि महिलाओं ने पौधों को अपने बच्चों की तरह पाला। पीठ पर गोबर, खाद-पानी ढोकर पौधों को दिया। वर्तमान समय में ये पेड़ जल स्रोतों को रिचार्ज कर लगभग 900 लोगों को पानी, चारा-पत्ती और जलावनी लकड़ी दे रहे हैं। साथ ही पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के जरिए गांव में ही रोजगार भी पैदा कर रहे हैं।
प्रति परिवार इकट्ठा करते हैं चंदा
कर्णप्रयाग। पुडियाणी गांव की जिला पंचायत सदस्य गायत्री देवी, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य दिव्य दर्शन नेगी, डीडी सिंह, बलबीर सिंह आदि कहते हैं कि महिलाओं ने जब जंगल बसाने की नींव रखी तो शाकंबरी देवी को अध्यक्ष और पूरण सिंह नेगी को वन रक्षक चुना गया था। समिति में बुधाणी देवी, हेमा देवी, गायत्री देवी ने भी सहयोग गया। पहले समिति थी अब पेड़ों की सुरक्षा का जिम्मा ममंद के पास है, इसमें अध्यक्ष लीला देवी हैं। वहीं सरपंच मदन सिंह भी पेड़ों की रखवाली में लगे रहते हैं। शुरुआत में जंगल के रख-रखाव के लिए प्रति परिवार दो रुपये चंदा किया जाता था। वर्तमान समय में भी गांव के लोग पांच-पांच रुपये चंदा एकत्र करके जंगल की सुरक्षा के लिए रखे गए व्यक्ति को वेतन के तौर पर देते हैं। समय-समय पर पेड़ों की मानीटरिंग भी की जाती है।
इंसेट
पौधों में लग रहे कीड़े
बासिला प्रजाति का खरपतवार और अज्ञात कीड़ा बांज के पौधों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। ग्रामीणों ने कहा कि कई बार वन विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल पाया।
पुडियाणी गांव में बांज का जंगल है। महिलाओं की ओर से तैयार किए गया जंगल अच्छी पहल है। यहां पेड़ों को आग से बचाने के लिए पूरे इंतजाम किए जाएंगे। आग बुझाने में विभाग ग्रामीणों का सहयोग भी लेता है। - रेंजर प्रदीप गौड़, वन प्रभाग कर्णप्रयाग।

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