बुग्यालों से मदर प्लांट लाकर स्वयं ही किया शोध

Bageshwar Updated Fri, 02 Nov 2012 12:00 PM IST
बागेश्वर। हिमालयी बुग्यालों में कीमती जड़ी बूटियां अवैध दोहन से लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई तो खलझूनी निवासी भागीचंद्र सिंह टाकुली ने इनके संरक्षण की ठान ली। बुग्यालों से पौधे लाकर इन्हें अपनी भूमि पर उगाने का प्रयास किया। जलवायु और तमाम अन्य विषमताओं से जूझते हुए उन्हाेंने इतने अनुभव प्राप्त किए कि आज मात्र आठवीं पास भागीचंद्र जड़ी बूटियाें के सफल किसान ही नहीं इसके प्रशिक्षक और वैज्ञानिकों के अच्छे सहयोगी भी बन चुके हैं।
71 वर्षीय श्री टाकुली के अनुसार 1980-85 के दौरान वह भेड़ाें के साथ कई बार बुग्यालों में गए। जहां तस्करों ने कीमती जड़ी बूटियों को खोदकर खत्म कर दिया था। हिमालय की कीमती विरासत को मिटते देखकर उन्हें काफी तकलीफ हुई और संरक्षण का संकल्प लिया। बुग्यालों से मदर प्लांट लाकर खलझूनी गांव में अपने खेतों में उगाने का प्रयास किया। उच्च से निमभन तापमान में आने पर जलवायु, मिट्टी, मौसम, कीट, बीमारी सहित तमाम तरह की असमानताएं आड़े आती रहीं। परिवार के सदस्य भी परेशान रहे। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। मिट्टी, धूप छांव, पानी, खाद आदि में निरंतर बदलाव करके कई सालों बाद इस बात का ज्ञान प्राप्त किया कि किस प्रजाति को उगने के लिए क्या चाहिए। पांच सालों तक घोर असफलता और संघर्ष का दौर चला। इसके बाद 1995 में श्री टाकुली ने अपने अनुभवों से वहां की जलवायु में उत्पादन की तकनीक विकसित की। इस वक्त वह अपनी 40 नाली भूमि पर चिरायता, कुटकी, कूट, काला जीरा, वन तुलसी आदि का व्यावसायिक उत्पादन करके सालाना 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक कमा लेते हैं। 45 नाली के अन्य चेक में उत्पादन करने का लक्ष्य है। एक नाली भूमि पर प्रदर्शन के लिए अतीस, सालमपंजा बज्रदंती सहित कई प्रजातियां उगाई गई हैं। श्री टाकुली ने बताया कि इस कार्य में उन्हें गोपेश्वर स्थित जड़ी बूटी शोध संस्थान और कोसी स्थित जीबी पंत पर्यावरण संस्थान का सहयोग मिलता रहा है। आज 71 साल के भागीचंद्र को सरकारी विभाग और एनजीओ प्रशिक्षण देने के लिए बुलाते हैं। भागीचंद्र के अनुसार जीवन के इस पड़ाव पर अपनी सफलता से वह संतुष्ट हैं।
-उच्च हिमालयी क्षेत्र की जड़ी बूटियों पर भागी चंद्र जी का कार्य और अनुभव अनुकरणीय है। उनमें आज भी किसी युवा की तरह सीखने और कर गुजरने का जज्बा है। इसी कारण उन्हें प्रशिक्षक के तौर पर बुलाया जाता है। विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों में उनका विशेष सम्मान है। -डा विजय भट्ट, वरिष्ठ वैज्ञानिक जड़ी बूटी शोध संस्थान मंडल, गोपेश्वर।

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