बेहतर अनुभव के लिए एप चुनें।
TRY NOW

22 साल के ब्रेक के बाद 1949 में शुरू हुई थी रामलीला

Bageshwar Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

ख़बर सुनें
बागेश्वर। 1927 में बंद हुई बागेश्वर की रामलीला 1949 में भरत मिलाप के साथ दोबारा शुरू हुई थी, तब से यह आज तक अविरल चल रही है। 1927 में रामलीला किन्हीं कारणों से नहीं हो पाई थी। उस दौरान रामलीला मिट्टी तेल से जलाए जाने वाले पेट्रोमैक्स के उजाले से होती थी। देर रात दो बजे तक लोग इसका लुत्फ उठाते थे।
विज्ञापन

बागेश्वर नगर की रामलीला का इतिहास काफी पुराना है। यहां की रामलीला अल्मोड़ा जिले के बाद शुरू हुई। जानकारों के अनुसार 1880 के दशक में इसका शुभारंभ हुआ लेकिन 1927 तक चलने के बाद यह किन्हीं कारणों से बंद हो गई। बाद में स्थानीय लोगों ने 1949 में दोबारा रामलीला की शुरूआत की। तब भरत मिलाप मंचन से रामलीला का शुभारंभ हुआ था। यह रामलीला मंचन कत्यूर बाजार में संपन्न हुआ। दूसरे साल से रामलीला ऐतिहासिक रामलीला मैदान में विधिवत शुरू हुई जो आज तक सुचारु रूप से चल रही है। रामलीला देखने के लिए कत्यूर, दुग घाटी सहित विभिन्न क्षेत्रों के लोग यहां आते थे। रामलीला का मंचन पेट्रोमैक्स के उजाले में होता था जबकि आने जाने के लिए लोग छिलके का सहारा लेते थे। 1952 में पहली बार बिजली आई तो लोगों ने पूरे उत्साह के साथ रामलीला का मंचन किया। बिजली भी तब पूरी रात नहीं मिलती थी। 11 बजे बाद बिजली बंद हो जाती थी। तब आधी रामलीला बिजली तो आधी पेट्रोमैक्स के उजाले से होती थी। अभावों के बावजूद रामलीला देखने का क्रेज बढ़ता गया। तब दूरदराज से लोग रामलीला देखने आते थे।


साह 1952 में बने भरत
बागेश्वर। रामलीला कमेटी के संरक्षक शंकर लाल साह 1952 में पहली बार मंच पर उतरे। उन्होंने तब भरत का किरदार निभाया। उसके बाद उन्होंने राम, हनुमान, सुमंत, परशुराम, अंगद, विभीषण तथा दशरथ की भूमिका निभाई। भरत मिलाप के साथ जब 1949 में रामलीला शुरू हुई तब जगदीश साह ने सीता की भूमिका निभाई थी। रामलीला को चरम तक पहुंचाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। आज भी उनके बेटे नवीन साह रामलीला में कई महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे हैं।

पुलिस से ज्यादा कारगर थे वालिंटियर
बागेश्वर। आज बागेश्वर की रामलीला में शांति व्यवस्था के लिए पुलिस बल लगाया जाता है। 1949 में जब रामलीला दोबारा शुरू हुई तब शांति व्यवस्था के लिए वालिंटियरों की नियुक्ति होती थी। यह वालिंटियर पुलिस से अधिक कारगर साबित होते थे।

आज भी याद आते हैं दुर्गा दत्त पंत
बागेश्वर। रामलीला की शान कहे जाने वाले हास्य कलाकार देवीदत्त पंत को भी उस जमाने के दर्शन नहीं भूलते हैं। पंत जी सामाजिक विषय पर जबरदस्त हास्य परोसते थे कि लोग उनके मंच पर आने का इंतजार करते थे।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X