चीनी युद्धपोत के मुकाबले कोे विक्रमादित्य की प्रतीक्षा

Bageshwar Updated Thu, 11 Oct 2012 12:00 PM IST
बागेश्वर। दक्षिण चीन सागर में चीन के विमान वाहक पोत की मौजूदगी के चलते समुद्री सीमाओं पर भारत के लिए सुरक्षा संबंधी चुनौती खड़ी हो सकती है। और वियतनाम में भारत के पेट्रोलियम कार्यक्रम पर भी असर पड़ सकता है। भारत के अपने पहले पोत को तैयार होने में वक्त लगेगा। क्षेत्र में सामरिक संतुलन के लिए यह जरूरी है कि भारत रूस से खरीदे गए विमान वाहक पोत विक्रमादित्य को शीघ्र ही प्राप्त करके हिंद महासागर में उतार दे।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ (अवकाश प्राप्त ले जनरल) मोहन चंद्र भंडारी का कहना है कि चीन ने दक्षिण एशिया में अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश छोड़ी नहीं है। कोको आयरलैंड, बंग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान की तरफ से वह अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत करने में जुटा है। उसने तीन हफ्ता पहले भारत की समुद्री सीमा के पास दक्षिण चीन सागर में अपना विमान वाहक पोत उतार दिया है। हालांकि यह पोत उसने बहुत पहले रूस से खरीदा था, और अब यह पुराना हो गया है। इसके बावजूद इस शिप एअरक्राफ्ट से वह क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ा सकता है। दक्षिण चीन सागर में चीनी पोत की गतिविधियां इस कार्यक्रम में रुकावट पैदा कर सकती हैं। इस क्षेत्र में भारत का आईएनएस हरमीज नामक विमान वाहक पोत तैनात है। जो 50 साल पुराना है और फाकलैंड युद्ध में भाग ले चुका है। भारत ने ब्रिटेन से इसे खरीदा था। भारत ने बहुत पहले ही समुद्री सीमाओं की हिफाजत के लिए एक अन्य पोत हिंद महासागर में उतारने की योजना पर अमल शुरू कर दिया था। इसके लिए रूस से गौर्सकोव नामक विमानवाहक पोत का सौदा हो चुका है। इसका भारतीय नाम आईएनएस विक्रमादित्य रखा गया है। भारत दो साल पहले ही इसकी कीमत भी अदा कर चुका है।

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