रिंगाल का परंपरागत व्यवसाय संकट में

Bageshwar Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
बागेश्वर। रिंगाल के परंपरागत कारोबार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पैदा होेने वाले रिंगाल से घरेलू उपयोग तथा साज सज्जा की शानदार वस्तुओं का निर्माण होता है। सैकड़ों दस्तकार इसके साथ जुड़े हुए हैं। बाजार के अभाव में उन्हें समुचित मूल्य नहीं मिल पाता। जिस कारण रिंगाल के बुनकर इससे विमुख हो रहे हैं।
रिंगाल का उत्पादन जिले के मल्ला तथा बिचला दानपुर सहित आस पास के ऊंचाई गांवों में रिंगाल प्रचुर मात्रा में होता है। रिंगाल जहां पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं वह क्षेत्र के लोगों के रोजगार का भी अच्छा जरिया भी है। हरकोट, धुरकोट, सूपी, झूनी, खल्झूनी, मिकिला खलपट्टा, लाहुर, गांसी, किमू, गोगिना, मल्खाडुंगर्चा, लीती, हाम्टीकापड़ी, बास्ती तथा भनार आदि गांवों के ग्रामीण रिंगाल से चटाइयां, डलिया, आसन, कलमदान, शोकेश तथा पर्स सहित दैनिक उपयोग और घरेलू साज सज्जा की वस्तुओं का निर्माण करते हैं। रिंगाल की वस्तुओं टिकाऊ होती हैं। किंतु यहां तैयार होने वाली वस्तुओं के मार्केटिंग की समस्या आज भी बनी है। पूर्व में परंपरागत मेलों और अन्य व्यापारिक गतिविधियों के जरिए मार्केटिंग अथवा विनिमय हुआ करता था। आधुनिकता तथा मशीनीकरण के असर ने पूरी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। दानपुर क्षेत्र में रिंगाल से निर्मित वस्तुओं के विपणन के लिए शासन स्तर से भी अभी तक ठोस पहल नहीं हुई है। 65 वर्षीय बाली राम के मुताबिक चार हाथ लंबी और तीन हाथ चौड़ी चटाई बनाने में एक हफ्ते का समय लगता है। जिससे लगभग सात सौ रुपये की आमदनी होती है। इसी तरह दो दिनों में तैयार होने वाली डलिया 150 रुपये में बिकती है। विपणन की ठोस व्यवस्था नहीं होने से बेचने के लिए गांव-गांव जाना पड़ता है। कुछ लोग कपकोट, बागेश्वर आदि की बाजारों में भी यह वस्तुएं बेचते हैं। बुनकरों का कहना है कि सरकार विपणन की व्यवस्था करे तो इस परंपरागत व्यवसाय को बचाया जा सकता है।

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