शुगर मिल पर कब्जा भी दिला चुका नामधारी

Amroha Updated Tue, 04 Dec 2012 05:30 AM IST
अमरोहा। लिकर किंग पोंटी चड्ढा डबल मर्डर मामले में तेजी से उभरे उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन सुखदेव सिंह नामधारी का नाम चरचा में आते ही इनसे जुड़े अन्य तमाम प्रकरण भी दिन व दिन सुर्खियाें में हैं। सरकार से औने-पौने दाम में सहकारी चीनी मिल खरीदने के बाद ‘नामधारी’ ही करीब तीस-चालीस खुली जीप में असलाहधारी समर्थकों को लेकर मिल पहुंचा था। वीआरएस की जिद पर डटे श्रमिकों को धरने से उठाकर गोदामों व प्लांट पर कुछ ही मिनटों में कब्जा कर लिया। ‘दो लाइन में’ बात मान लेने का इशारा करके पोंटी और सूबे की सरकार से रसूखों की हनक दिखाता रहा। इतना ही नहीं मौन खडे़ आला अफसरों ने शाम को लिखा-पढ़ी करा मिल की चाबी भी लगे हाथों ‘सरकार’ को थमा दी थी।
दरअसल, वर्ष 2009 में सहकारी चीनी मिल बेचने से गुस्साए श्रमिकों ने संगठन बनाकर जबरदस्त विरोध किया था। वर्ष 2010 में वीआरएस की मांग को श्रमिक धरने पर बैठ गए। टेकओवर में आडे़ आ रहे विरोध निपटाने का जिम्मा पोंटी चड्ढा ने ‘नामधारी’ को सौंप दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक 30-40 खुली जीप के बीच में सवार सैकड़ों राइफलधारियों के साथ तीन काले शीशे चढ़ी सफारी गाड़ियों से उतरा नामधारी गेट खुलवाकर सीधे धरनास्थल जा धमका। निकल लो..शब्दों से निहत्थे श्रमिकों को इरादे जाहिर कर दिए।
पुलिस व प्रशासन के आला अफसरों की फौज पहुंच गई। लखनऊ से मिले डायरेक्शन के मुताबिक नामधारी से मिले और श्रमिकों को वार्ता का हवाला देते हुए किनारे ले गए। बकौल श्रमिक नेता हरपाल यादव, शरफुद्दीन, सुभाष दूबे के इनसे स्पष्ट कह दिया गया कि मांगें पूरी हो जाएंगी, फिलहाल धरना समाप्त कर दो। बीस मिनट में पूरी मिल पर असलाहधारियों का कब्जा हो गया। नामधारी के कान पर मोबाइल और उंगलियों से साथियों को हिदायतें इशारे बराबर चलती रहीं। हालांकि समझौते के मुताबिक आंदोलन से हटना पड़ा। देर शाम अफसर भी सरकार को मिल की चाबी थमाकर लौट गए। फिलहाल उस नजारे को याद करने भर से इनका बदन आज भी सिहर जाता है। उससे कहीं ज्यादा रोजी-रोटी छिन जाने का गुबार भी सैकड़ों परिवारों की बंद जुबां से आज भी रिस रहा है।

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