पिताजी मत रोओ, हमें कौन संभालेगा!

Almora Updated Fri, 26 Oct 2012 12:00 PM IST
अल्मोड़ा। सिलखोड़ा गांव में तेंदुए के हमने में मारी गई उप प्रधान शीला बिष्ट का दसवीं में पढ़ने वाला बेटा गोकुल मां को याद करके एकांत में रोता रहता है लेकिन पिता को फफकता देख अपने आंसू रोकने का प्रयास करते हुए पिता को हौसला दिला रहा है। पिता को रोता देख वह बोला-पिताजी मत रोओ, आप ऐसा करेंगे तो हमें कौन संभालेगा।
तेंदुए ने सिलखोड़ा गांव में 22 अक्तूबर को उप प्रधान 40 वर्षीय शीला बिष्ट को मार डाला था। शीला देवी के तीन बच्चे हैं। सबसे बड़ी पुत्री रिचा मथुरा से नर्सिंग ट्रेनिंग कर रही है। बड़ा बेटा जीआईसी लमगड़ा में 12वीं में पढ़ रहा है। छोटा बेटा गोकुल पौधार में दसवीं में पढ़ता है। दिवंगत महिला उप प्रधान के पति हिम्मत सिंह पौधार में छोटी सी दुकान चलाते हैं, लेकिन इससे से इतनी आय नहीं होती है कि परिवार का भरण-पोषण हो सके। हिम्मत सिंह भी कुछ समय पहले ही लंबी बीमारी से उबरे हैं। ऐसे में शीला भी खेती के साथ दूध व्यवसाय करके परिवार के भरण पोषण में सहयोग देती थी। पति हिम्मत सिंह बताते हैं कि शीला ने उन्नत नस्ल की गाय पाली थी। वह समिति के माध्यम से प्रतिदिन 10 लीटर दूध बेचती थी। जिससे बच्चों की शिक्षा और परिवार का खर्च चलता था। हिम्मत सिंह कहते हैं शीला के मारे जाने से परिवार अस्त-व्यस्त हो गया है। इसके बाद वह खुद को नहीं रोक पाते और फफक कर रो पड़ते हैं। पिता को रोता देख छोटा बेटा गोकुल पिता के आंसू पोंछकर उन्हें ढांढस बंधाने का प्रयास करता है। शीला की मौत से सिलखोड़ा गांव में अब भी मातमी सन्नाटा छाया है। उच्यूर पट्टी के गांवों में तेंदुए की अब भी दहशत है।

आखिर गांव छोड़कर कहां जाएं!
ग्रामीणों की जिंदगी कीमती है या जानवरों की?
अल्मोड़ा। तेंदुए के हमलों से जहां पलना, हुनंा, चौनली, सिलखोड़ा आदि गावों में रहने वाले लोग भारी दहशत में हैं। ग्रामीण वन कानून से भी बेहद खफा हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार लोगों की चिंता के बजाए जंगली जानवरों की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील है। उन्होंने सवाल किया लोगों की जिंदगी ज्यादा कीमती है या जंगली जानवरों की। आखिर लोग गांव छोड़कर कहां जाएंगे।
सत्यों गांव के दीवान सिंह सत्वाल का कहना था कि सरकार ने वन्य जीव संरक्षण के कानून बनाकर जीवों को तो संरक्षण दिया है लेकिन लोगों के जान-माल की सुरक्षा की चिंता नहीं की है। जो सरकारों के असंवेदनशील रवैये को दर्शाता है। पलना गांव की तुलसी देवी (65), लक्ष्मी देवी (62) तथा बीना देवी(31) कहती हैं कि गांव बेरोजगारी, पलायन, आदि से पहले ही खाली हो रहे हैं। सूअर, बंदर फसल उजाड़ कर काश्तकारों की आजीविका चौपट कर रहे हैं। अब तेंदुए भी जान के दुश्मन बन गए हैं। उन्होंने कहा सरकार को ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए प्रभावी योजना बनानी चाहिए।

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