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कमेटी करती थी लोगों के रहने-खाने का इंतजाम

Almora Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
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दन्यां। चौगर्खा क्षेत्र में दन्यां की रामलीला सौ वर्ष से अधिक पुरानी है। यहां रामलीला कब शुरू हुई हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है, लेकिन बुजुर्गों की मानें तो दन्यां में सबसे पहले 1915 में रामलीला मंचन प्रारंभ हुआ। उस दौर में रामलीला धार्मिक कार्य और मनोरंजन के साथ ही जन मिलन का भी माध्यम था। पेट्रोमैक्स की रोशनी में होने वाले मंचन में देर रात तक लोग रामलीला देखने जमे रहते थे। शुद्ध शास्त्रीय रागों पर आधारित गायन परंपरा आज भी जारी है।
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दन्यां में रामलीला की शुरुआत 1915 में मानी जाती है। रंगोड़ तथा दारूड़ पट्टी के लोगों के लिए रामलीला महोत्सव पर्व की तरह होता था। 1974 तक पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला मंचन चला। 1975 में बिजली पहुंचने पर ध्वनि विस्तारकों और लाइट का प्रयोग होने लगा। 93 वर्षीय पल्ली दन्यां निवासी नारायण दत्त पंत बताते हैं कि 1915-16 में रामलीला का आयोजन पल्ली दन्यां में हुआ। उस दौर में लोगों को हल्द्वानी तक पैदल सफर तय करना पड़ता था। पात्रों के लिए वृंदावन से सनील तथा मलमल के कपड़े और स्टेज के लिए रंगीन परदे लाए गए। 86 वर्षीय भनार निवासी हंसादत्त जोशी ने बताया कि आजादी के काफी समय बाद तक दूर-दराज के गांवों से भी लोग रामलीला देखने आते थे। दूरस्थ क्षेत्र से आने वाले दर्शकों के भोजन तथा रात्रि विश्राम की व्यवस्था कमेटी के पदाधिकारी स्थानीय लोगों के घराें पर निशुल्क करते थे। खरीफ की फसल समेटने और घास कटाई के बाद कार्तिक तथा मार्गशीष माह में रामलीला आयोजन होता था। कामदेव, लीलाधर पंत, कृष्णानंद पंत, सीताबर जोशी, रघुवर दत्त, मथुरा दत्त, रमेश चंद्र पंत, काशीराम पंत (सभी दिवंगत) आदि पात्रों का अभिनय देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती थी। बुजुर्ग बताते हैं टीवी के चलन के बाद से रामलीला में भीड़ अपेक्षाकृत घटने लगी है साथ ही नई पीढ़ी का रुझान भी इस ओर कम होने लगा है।

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