स्कूली शिक्षा में शामिल हो कुमाऊंनी भाषा

Almora Updated Tue, 24 Jul 2012 12:00 PM IST
अल्मोड़ा। एसएसजे परिसर में स्कूली शिक्षा में लोक भाषा पाठ्यक्रम विषय पर हुई संगोष्ठी में वक्ताओं ने कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी भाषा को स्कूली शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए।
परिसर के जंतु विज्ञान विभाग सभागार में हुई संगोष्ठी में मुख्य वक्ता प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने कहा कि स्कूली शिक्षा में लोक भाषा को शामिल किया जाना समय की जरूरत है। मुख्य अतिथि साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कहा कि लोक साहित्य और भाषा साहित्य बड़ा विषय है। कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए मन से काम करना पड़ेगा। तभी भाषा संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को समझने के साथ ही उसका संरक्षण भी हो पाएगा।
अध्यक्षता करते हुए परिसर निदेशक प्रो. एचएस धामी ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा के मानक तय किए जाने चाहिए, ताकि इसे संविधान की आठवीं अनुसूचित में शामिल किया जा सके। डा. चंद्र प्रकाश फुलोरिया ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा बोलते हुए झिझक दूर होनी चाहिए। संचालन नवजोत जोशी ने किया।
संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि त्रिभुवन गिरि महाराज, डा. कपिलेश भोज, गोविंद बल्लभ बहुगुणा, दामोदर जोशी, उदय किरौला, उमेश चंद्र पांडे आदि ने विचार रखे। भावना जोेशी द्वारा लिखित पुस्तक पछ्याणो आपण डाव बोटों कैं पुस्तक का विमचोन भी किया गया। सोमेश्वर बौरारो घाटी से आए रंगकर्मी मदन मोहन सनवाल ने हुड़किया बौल की बारीकियों से अवगत कराया। इससे पूर्व छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। प्रो. पीसी पांडे, ईश्वरी दत्त जोेशी, गिरीश चंद्र पंत, ज्योति बिष्ट, जीवन आर्या भावना जोशी आदि मौजूद थे।

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