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विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी की शान है सदियों पुरानी कढ़ुआ कारीगरी, हाल ही में मिला है नेशनल अवार्ड

तबस्सुम, अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 09 Aug 2018 05:42 PM IST
वाराणसी की खास कढ़ुवा साड़ी
वाराणसी की खास कढ़ुवा साड़ी - फोटो : अमर उजाला
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अनगिनत मोतियों का समुंदर है काशी और इसका बेशकीमती नगीना है बनारसी साड़ी, जो दुलहन में तन पे सजी तो सौभाग्य बनी, राजमहलों में गई तो शान का प्रतीक बनी और फैशन में आई तो नए कीर्तिमान गढ़े। खूबियां इतनी कि गिनना मुश्किल, लिखना मुश्किल। सदियां बीतीं, बनारसी साड़ी ने भी वक्त के साथ अपना कलेवर बदला। कभी हाथों से बुनी गई तो अब पावरलूम में बन रही है। वक्त के साथ इसके डिजाइन भले बदले लेकिन कुछ कलाकारी ऐसी भी रही जो इंसानी हाथों की तलबगार ही है। ऐसी ही एक कारीगरी है कढ़ुआ...।
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सदियों पुरानी विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी की शान है कढ़ुआ कारीगरी जो कि पूरी तरह से हाथ की कला है। यूं कहें कि बनारसी साड़ी की पहचान ही कढ़ुआ से हैं। इसमें ना पावरलूम का इस्तेमाल, ना किसी मशीन का। इसकी डिजाइन इसकी बूटी हस्तकला पर निर्भर है, पूरी तरह से महीन कारीगरी।

बूटीदार, आड़ा, जंगला, मीनादार जैसी डिजाइन में अगर कढ़ुआ कारीगरी मिल जाए तो फिर उस बनारसी साड़ी की बात की क्या। इसी बनारसी कढ़ुआ साड़ी के कारीगरों अनवार अंसारी व कलीमुद्दीन को हथकरघा दिवस पर नेशनल अवार्ड और कबीर अवार्ड से नवाजा भी गया है। 

बजरडीहा के बुनकर शकील अहमद बताते हैं कि बनारसी साड़ी कढ़ुआ बुनाई के लिए मशहूर है। सैकड़ों बरसों पुरानी काशी की ये कला मेहनत और वक्त मांगती है। यही वजह है कि पावरलूम आने के बाद इसके कारीगर कम तो हुए लेकिन इसकी पूछ कहीं से कम नहीं हुई। पावरलूम पर काम करने वालों ने कोशिश बहुत की इसकी कॉपी करने की लेकिन इस कला की ये विशिष्टता ही है जो आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।

बनारसी कढ़ुआ कला जीआई उत्पाद है। जीआई विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत बताते हैं कि बनारसी साड़ी के कई व्यवसायी मशीन के काम को हैंडलूम का बताकर अपने उत्पाद बेच रहे हैं। ऐसे लोगों पर सरकार कानूनी कार्रवाई करने की तैयारी में है। 
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