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होली के रंग हस्तियों के संग

Varanasi Updated Wed, 27 Mar 2013 05:31 AM IST
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नहीं भूलती दादी की त्योहारी
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बचपन की होली बहुत याद आती है। तब हुड़दंगई नहीं होती थी। हम लोग पड़ोसियों के साथ होली खेलते थे। भाई-चारा ऐसा था कि पूछिए मत। हम लोग अपने बड़ों के चरणों में टीका लगाते थे। तब त्योहारी भी खूब मिलती थी। मुझे अब भी दादी की वो त्योहारी याद है जब होली पर उन्होंने मेरे गले में मेवे की माला पहनाकर अबीर का टीका लगाया था। इस बार मेरा पूरा परिवार बनारस में होली मनाएगा। मेरी नजर में होली का मतलब प्रेम बांटना है। आप जितना प्रेम बांटेंगे, गिले शिकवे मिटाकर लोग उतना ही आपसे प्यार करेंगे। दौर बदला तो होली खेलने के तौर-तरीके भी बदल गए। अब लोग रंगों से दूर होने लगे हैं। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि रंग छूटेगा या नहीं। महंगाई के साथ हर चीज में मिलावट जो बढ़ती जा रही है। -पद्मभूषण राजन-साजन मिश्र, शास्त्रीय गायक

प्यार का रंगोत्सव है होली
बचपन की होली खूब याद आती है। गांव के लड़कों का झुंड रात में खा-पीकर निकलता था। सूखी लकडि़यां काटते थे या किसी के घर से गोहरी, चिपरी चुराकर होलिका में डाल देते थे। होड़ रहती थी कि मेरे गांव की होलिका सबसे ऊंची रहे। कभी-कभी तो हरे-भरे पेड़ भी काट डालते थे। खूब गालियां सुनते थे। एक साल तो रात में सो रहे आदमी को चारपाई समेत होलिका में डाल दिया था। तब बहुत हंगामा हुआ। मार भी पड़ी थी। अब तो होली में बहुत बदलाव आ गया है। रंगों, टोपियों, पिचकारियों की कमी नहीं है पर आदमी का दिल छोटा हो गया है। यह वक्त का प्रभाव और बाजारवाद का दबाव है। होली मेरा सबसे प्रिय त्योहार है। यह अकेला त्योहार है जिसमें धर्म, जाति का कोई मतलब नहीं होता। होली प्यार और भाईचारा भरा रंगोत्सव है।- प्रो. काशीनाथ सिंह, कथाकार

रंगों के त्योहार में नहीं रहा पहले जैसा रस
मुझे बचपन का जोगीरा गाना खूब याद आता है। तब हमलोग 10-12 के झुंड में गांव के हर दरवाजे पर ढोलक लेकर पहुंच जाते थे। सदा अनंद रहें एहि द्वारे मोहन खेलत होरी...गाया जाता था। पहले बड़े ढंग से रंग खेला जाता था। अब तो ऐसे रंग पोत देते हैं कि छूटता ही नहीं। मैं सबसे रंग नहीं खेलता था। गांव में वैसे भी भाभियों से ही होली खेलने की प्रथा थी। आजकल के माहौल में होली का वो रस कहां रह गया है। तभी तो अब होली खेलने का मन ही नहीं करता। मेरा मानना है कि होली माने जो हो गया। हो लिया यानी जो पूरा हो गया। होली कुछ नया करने का संकल्प लेने का दिन है। बुरे कर्म, गिले-शिकवे खत्म करने और आगे की सोचने का त्योहार है होली। महंगाई ने होली का मजा बिगाड़ दिया है। रंग इतना महंगा हो गया है कि लोग अब टीक लगाकर रस्म पूरे कर लेते हैं।-पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र, उप शास्त्रीय गायक

हुड़दंगई ने छीन ली मस्ती
पुराने जमाने में होली में लड़कियां घर से बाहर निकलती ही नहीं थीं। उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी जाती थी। लड़कियां सिर्फ पकवान बनातीं और खिलाती थीं। होली खुशियों का त्योहार है। अच्छे से अच्छे पकवान बनाने-खाने का इससे बेहतर मौका नहीं आता। बदलते दौर के साथ होली मनाने के तौर-तरीके भी बदलते जा रहे हैं। फूहड़ता और हुड़दंगई ने इस त्योहार की मस्ती और जीवंतता को लगभग खत्म कर दिया है। मेरी यही मंगल कामना है कि लोग प्यार और मस्ती के इस त्योहार में गिले-शिकवे मिटाकर आपस में गले मिलें। होली गले मिलकर आपसी सौहार्द बढ़ाने का त्योहार है। जिस तरह होली के हजार रंग बिखरते हैं उसी तरह लोगों के जीवन में भी रंगों की भरमार हो।-पद्मभूषण गिरिजा देवी, शास्त्रीय गायिका

किशोरों के धमाल से बचने में ही गुजर जाती है अपनी होली
जो होली हमको भीतर से रंग देती थी, वह तो बचपन के साथ ही गुम हो गई है। बचपन में होली की पूर्व संध्या पर होलिका जलाने का उत्साह शामिल था। होली के दिन का पूर्वार्द्ध धुरखेल से शुरू होता था। इसमें कादों-कीचड़ का भी इस्तेमाल होता था। दिन के उत्तरार्ध में रंग खेले जाते थे। इसमें वासंती रंग हम पलाश के फूलों से तैयार करते थे। उन फूलों को इकट्ठा करने की प्रक्रिया कुछ दिन पहले से शुरू हो जाती थी। शाम का समय गांव में घर-घर घूमकर बुजुर्गों को प्रणाम करने और आशीष बटोरने का होता था। नव यौवन आया तो होली के रंग में भंग की हरियाली भी घुल गई। अब तो अपनी होली अपने को किशोरों के धमाल से बचाने में ही गुजर जाती है। -ज्ञानेंद्र पति- साहित्यकार

होली के दिन मिली जीत
1985 में मतगणना देर से समाप्त हुई। जीत का ऐलान होली के दिन हुआ। घर पहुंचे तो रंगों का दौर शुरू हो गया। पहले लोग ढोल, मंजीरा, बाल्टी, पिचकारी लेकर घरों से निकलते थे। टोली के साथ ही होली खेली जाती थी। गाते-गाते सब लोग डेढ़सी के पुल पर पहुंच जाते थे। वहां टोलियों का गायन होता था। कुछ लोग गाते और कुछ सुनते थे। दोस्त, विरोधी सबसे लोग मिलते थे। हफ्ते भर पहले ही पीतल की पिचकारी का वाशर दुरुस्त होने लगता था। उसकी जांच की जाती थी। अब तो पिचकरी चीन में बनने लगी है। विश्वविद्यालय में अंजना चुनाव लड़ रही थीं। होली का समय होने के कारण खूब हुड़दंग हुई थी। जावेद अख्तर, आनंद कुमार की टोली हमारे साथ चलती थी। तब विश्वविद्यालय के हर छात्रावास में विद्यार्थी सारी रात होली गाते थे। उस समय शालीनता और सामूहिकता का जोर था।-पूर्वमंत्री शतरुद्र प्रकाश
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