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कभी ढोल बजा कभी ढाक की अनुगूंज

Varanasi Updated Wed, 13 Feb 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। ड्रम वादन को अपने परिश्रम और अभिनव प्रतिभा के बल पर नया मकाम देने वाले आनंद शिवमणि ने मंगलवार की शाम यहां नेत्रहीन बच्चों के बीच संक्षिप्त किंतु शानदार ड्रम वादन किया। शिवमणि की प्रतीक्षा में शाम चार बजे से ही प्रज्ञाचक्षु विद्यार्थियों का समूह सभागार में उपस्थित हो गया था।
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शाम करीब पौने छह बजे शिवमणि जब दुर्गाकुंड स्थित अंधविद्यालय पहुंचे तो वह अकेले नहीं थे। उनके साथ गायिका रूना रिजवी भी थीं। इससे पूर्व बनारस में दी गई सभी प्रस्तुतियों में विशुद्ध रूप से ड्रम वादन करने वाले शिवमणि ने इस बार कुछ अलग किया। रूना लोकप्रिय भजनों और गीतों का मुखड़ा गाती रहीं और शिवमणि अपनी कला दिखाते रहे। ड्रम वादन को आंखें बंद करके सुननेे पर प्रतीत होता कभी ढोल बज रहा है तो कभी ढाक की अनुगूंज सुनाई पढ़ती। कभी लगता मृदंग की थाम मुखर हो रही है तो कभी नगाड़े के उच्च स्वर गूंजने लगते। गोविंद बोलो हरि गोपाल बोले...ऐ मेरे वतन के लोगों आदि गीतों पर ड्रम वादन से श्रोताओं को आनंदित करने वाले शिवमणि ने श्रोताओं की फरमाइश पर बापू के प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम...की प्रस्तुति से कार्यक्रम को विराम दिया। बेशक शिवमणि अपने पूरे ड्रम सेट के साथ मंचासीन नहीं हुए थे लेकिन मिनी सेट के साथ भी उनकी प्रस्तुति कहीं से कमजोर नहीं थी।

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कुंभ नगरी का एक एक क्षण चमत्कारी रहा-1232
अमर उजाला ब्यूरो
वाराणसी। विश्वविख्यात ड्रम वादक आनंद शिवमणि ने कहा है कि यदि इस वर्ष कुंभ में नहीं आता तो जीवन में सबसे सुखद अनुभूति को महसूस करने से वंचित रह जाता। महाकुंभ नगरी में मैंने तीन दिन और तीन रातें गुजारीं। उस दौरान एक एक क्षण चमत्कारिक महसूस हो रहा था।
मंगलवार को दुर्गाकुंड स्थित अंधविद्यालय में पत्रकारों से बातचीत में शिवमणि ने कहा कि अपने गुरु सदानंद स्वामी के बुलावे पर कुंभ में आया था। वहां से लौटते वक्त बनारस आने से खुद को रोक नहीं सका। करीब 20 वर्ष पूर्व अंधविद्यालय परिसर में मैंने पहली बार ड्रम वादन किया था। उस कार्यक्रम की अनुभूतियां अब भी मेरे साथ हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चे नेत्रहीन जरूर हैं किंतु इनके बीच कार्यक्रम प्रस्तुत करके मुझे अतिरिक्त ऊर्जा अनुभूत होती है। मैं जब भी बनारस आऊंगा हर बार इन बच्चों के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करूंगा। शिवमणि मंगलवार को मुंबई लौटने से पहले कुछ घंटों के लिए यहां रुके थे। अंध विद्यालय में कार्यक्रम प्रस्तुत करने से पूर्व वह चुनार के निकट डगमगपुर स्थित दीनदयाल जालान के फार्म हाउस पर गए जहां पारिवारिक माहौल में उन्होंने कार्यक्रम प्रस्तुत किया।

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