छेड़खानी के विरोध में साहित्यकारों ने भी खोला मोर्चा

Varanasi Updated Tue, 29 Jan 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। विश्वविद्यालय का काम खोट काढ़ना है। वह विद्यार्थियों को आधुनिक संस्कारों से लैस ही नहीं करता बल्कि उनके कुसंस्कारों को हटाता भी है। छेड़खानी करने वाले छात्र भी हमारे ही बच्चे हैं, लेकिन हम उनको इसी तरह नहीं रहने दे सकते हैं। उनकी दुष्प्रवृत्तियों के प्रतिकार में नारी शक्ति के जिस रूप का अभ्युदय हुआ है उसका भी हमें सम्मान करना होगा। रचनाकार, विश्वविद्यालय और प्रशासन का दायित्व है कि वे अपना पक्ष तय करें और उसे सामने रखें। यह बातें सोमवार को अस्सी घाट पर बीएचयू में हुई छेड़खानी की घटना के विरोध में हुई साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की बैठक में कवि ज्ञानेंद्र पति ने कहीं। उन्होंने कहा कि समय पर बात रखनी होगी क्योंकि असमय कही गई बात का उल्टा असर होता है।
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उन्होंने कहा कि बौद्धिक क्षेत्र का नेतृत्व स्त्रियां तेजी से अपने हाथ में ले रही हैं। हमारे सोशल जेनेटिक कोड में सामंती संस्कार बसे हुए हैं। वह इस बदलाव को सहन नहीं कर पा रहा है और प्रतिरोध हो रहा है। भारतीय समाज में बच्चियों के गर्भ से बाहर आने तक पर रोक लगाई जा रही है। बीएचयू की स्थापना के पीछे महामना की भावना आधुनिक समाज के निर्माण की ही थी। विश्वविद्यालय के संचालकों को इसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि उन पर संपूर्ण बौद्धिक जगत की निगाह है। डा. नंदा परांजपे ने जर्मन अध्यापिका के साथ हुई अभद्रता का उदाहरण देते हुए कहा कि परिसर का माहौल महिलाओं के लिए अच्छा नहीं है। डा. विक्रमादित्य चौधरी ने कहा कि छेड़खानी की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। पहली बार उसके खिलाफ आवाज उठी है। हर सुसंस्कृत व्यक्ति को इसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए। ध्यान रहे लड़कियां किसी दल की नहीं होतीं। निर्णय लिया गया कि साहित्यकार कुलपति को अपनी भावनाओं से अवगत कराएंगे और परिसर को सुरक्षित बनाने की मांग करेंगे। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव, डा. श्रीप्रकाश शुक्ल, डा. वाचस्पति, शायर दानिश, अल कबीर, डा. प्रशांत शुल्क, डा. आनंद तिवारी, डा. वाचस्पति, दीनबंधु तिवारी, अशोक आनंद, डा. एनके मिश्रा, जलेश्वर, रविशंकर आदि मौजूद रहे।

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