महफिलों की शान उमराव की कब्र हुई खंडहर

Varanasi Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
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वाराणसी। कितने आराम से हैं कब्र में सोने वाले, कभी दुनिया में था फिर फिरदौस में, अब लेकिन कब्र किस अहले वफा की है अल्लाह-अल्लाह... ये पंक्तियां हैं मरहूम उमराव जान अदा की जिन्हें दुनिया एक तवायफ के रूप में ज्यादा और आजादी की दीवानी के रूप में कम जानती है। ये पंक्तियां फातमान स्थित कब्रिस्तान में उनकी कब्र की हकीकत भी बयान कर रही है, जो लगभग खंडहर हो चुकी है।
जलाली शाह बाबा की मजार के पास उमराव जान की कब्र भी आसपास की कब्रों की तरह अपना अस्तित्व खोने की ओर अग्रसर है। सिरहाने संगमरमर का पत्थर न जड़ा होता तो बदहाल कब्र कब का बर्बाद हो चुकी होती। उमराव जान की कब्र के सामने नीम के पेड़ की टूटी हुई डाल बीते कई महीनों से पड़ी है। वहां तक पहुंचने के रास्ते झाड़-झंखाड़ से भरे हैं। उमराव की कब्र पर मकबरा बनाने के बारे में अब भी नहीं सोचा गया तो आने वाले दिनों में एक दिलेर और राष्ट्र भक्त महिला की आखिरी निशानी भी मिट्टी में मिल जाएगी। 1857 के गदर के समय लखनऊ से आकर बनारस में बसीं उमराव जान ने यहां रहते हुए भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले रखा। उनकी महफिल में अंग्रेजों का आना मना था। वह अंग्रेजों की महफिल में नाचती-गाती भी नहीं थीं। बनारस में उनका आखिरी मुजरा रायकृष्ण दास की बारादरी में हुआ था। फैजाबाद के डाकू दिलावर, जिसके खिलाफ उमराव के पिता ने गवाही दी थी, ने करीब सात वर्ष की उम्र में उसे चुरा कर लखनऊ में एक कोठे पर बेच दिया। यहीं उसे उमराव नाम मिला और नाच-गाने की तालीम।

मकबरा बनवाने की मांग
वाराणसी। धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों को बचाने के लिए काफी धन सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर खर्च किया जा रहा है बावजूद इसके उमराव जान की कब्र को मकबरे की शक्ल देने का ख्वाब धुंधला पड़ता जा रहा है। यह चिंता है डर्बीशायर क्लब के सदस्यों की। वे उमराव जान की 75वीं बरसी पर उन्हें याद करने के लिए उनकी कब्र पर इकट्ठा हुए थे। गुरुवार की दोपहर उमराव जान की मजार पर मुसलिम और हिंदू दोनों ही फातिहा पढ़ने पहुंचे। कब्र पर फूल चढ़ाने, शमा जलाने और फातिहा पढ़ने के बाद सभी ने एक स्वर में यहां मकबरा बनाए जाने की मांग प्रदेश सरकार से की। शकील अहमद,हैदर हुसैन, पारस लालवानी, धीरेंद्र श्रीवास्तव, जावेद खां, चिंतित बनारसी, विक्की यादव, वहीद खां, अफाक हैदर, रुस्तम अंसारी, शहनवाज उपस्थित रहे।

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