राग-ताल पर सिर चढ़कर बोली वायलिन की थ्रीजी

Varanasi Updated Sat, 22 Dec 2012 05:30 AM IST
वाराणसी। महामना की याद में शुक्रवार की शाम राग-ताल का समन्वय हर किसी के लिए यादगार बन गया। पद्मभूषण एन. राजम ने अपनी तीसरी पीढ़ी (थ्रीजी) के साथ वायलिन पर गतकारी से हर मौका खुशगवार बनाने की कोशिश की। यह कार्यक्रम महामना की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में आयोजित था।
संगीत प्रेमियों, जिज्ञासुओं और बनारस घराने के कलाकारों से खचाखच भरी दीर्घा से तालियों की बौछार तब गूंज उठी जब एन राजम मंच पर पहुंची। साथ में उनकी पुत्री संगीता शंकर और नतिनी रागिनी शंकर भी घराने की थाती सहेजती नजर आईं। उन्होंने शुरुआत की राग मारू विहाग से। सबसे पहले उन्होंने एक ताल में निबद्ध विलंबित गत बजाई। इसके बाद राग का विस्तार किया। द्रुत लय में तीन ताल की मोहक प्रस्तुति दी। इसके बाद राग झिंझोटी में उन्होंने बंदिश सुनाई, जिसे दर्शकों ने संजीदगी से सुना और बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट से हुनर को दाद दी। बनारस घराने की ठुमरी की धुन भी उन्होंने राग खमाज में बजाई। श्रोताओं के विशेष आग्रह पर दादरा की प्रस्तुति की और समापन राग भैरवी से किया। उनके साथ तबले पर पुंडलीक कृष्ण भागवत ने संगत की।
इनसेट
अपनापन पाकर विभोर हो उठीं राजम
वाराणसी। पं. ओंकार नाथ ठाकुर की शिष्या प्रोफेसर एम राजन अपनी प्रस्तुति के दौरान कई बार भाव-विभोर हो उठीं। 1959 से 1997 तक बीएचयू के संगीत विभाग में अपनी सेवा दे चुकीं राजम ने प्रस्तुति के दौरान मिले अपनापन और दर्शकों के बेशुमार प्यार से अभिभूत थीं। उनका कहना था कि लग रहा है कि मैं अपने घर में ही हूं...। बनारस की परंपरा और संगीत के प्रति संजीदगी को उन्होंने मुक्त कंठ से सराहा।

गूंजे स्वर हे महामना महान...
छात्र-छात्राओं की मोहक प्रस्तुति पर झूमे संगीत प्रेमी
अमर उजाला ब्यूरो
वाराणसी। बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में शुक्रवार की शाम महामना को संगीत एवं मंच कला संकाय के छात्र-छात्राओं ने स्वरांजलि अर्पित की। राष्ट्र निर्माण, सद्भावना, प्रेम और एकता पर आधारित गीतों की प्रस्तुति सराही गई।
सरस्वती वंदना के बाद हे महामना महान... गीत को तब युगल स्वरों में प्रस्तुत किया गया तो सभगार में उपस्थित संगीत प्रेमी झूम उठे। इसके बाद देश भक्ति गीत- देश के हर व्यक्ति को अभिमान होना चाहिए...की प्रस्तुति की गई। इसके बाद बांग्ला गीत- धनो धान्य पुष्पे भोरा... से भारत भूमि की महिमा का बखान किया गया। इसे कंपोज किया था संगीता पंडित ने। इसक बाद डॉ. सरयू आर सोनी के संयोजन में- गूंजे गगन में सदभावना...। ये है भारत की पहचान और हम वर्तमान हैं... गीतों की प्रस्तुति की गई। गीतों को स्वर दिया जया शाही, विदिशा हाजरा, शालिनी, शिवानी सोनकर, अंकिता गोस्वामी, पारुल दीक्षित, एकता, शुचि के अलावा आशीष जायसवाल, पंकज शर्मा, बैकुंठ अधिकारी, अंजन कुमार, आदित्य, अनुभव, अपूर्व, अंकित मिश्रा ने। हारमोनियम पर इंद्रदेव चौधरी, तबला पंकज राय, राजेंद्र मिश्र, बांसुरी हरि पौडियाल, वायलिन प्रभा, कीबोर्ड महेश, नीरज मिश्र ने सितार पर संगत की। संचालन सुप्रिया शाह और ज्ञानेंद्र पांडेय ने किया। यह प्रस्तुतियां प्रोफेसर शारदा वेलंकर के निर्देशन में हुईं।

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