सरोद से रचा गया गया अनूठा संगीत संसार

Varanasi Updated Fri, 21 Dec 2012 05:30 AM IST
वाराणसी। महामना स्मरणोत्सेव की दूसरी संध्या में सरोद वादन से संगीत का अनूठा संसार कुछ समय के लिए अस्तित्व में आ गया। सरोद के ख्यातिलब्ध उस्ताद अहमद अली खां की परंपरा जो विख्यात सरोदवादक पं. राधिका मोहन मोइत्रो के माध्यम से पं. बुद्धदेव दासगुप्ता तक पहुंची थी। उसी परंपरा के अंतर्गत हुए सरोद वादन ने गुरुवार की शाम काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में अनूठे संगीत संसार की रचना की।
सेनिया घराने के पं.बुद्धदेव दासगुप्ता ने गायकी अंग की बजाय बोल-बानी अंग में सरोद वादन किया। प्रचलित तंत्रवाद्य पर अप्रचलित वादनशैली सभागार में उपस्थित एक एक श्रोता के लिए सम्मोहन का कारण रही। जो जानकार थे गहराई में डूबे जो संगीत नहीं समझते वे भी रसधार में प्रवाहित थे। कोलकाता के बुद्धदेव दासगुप्ता ने सर्वप्रथम राग जयजयवंती की अवतारणा की। आलाप जोड़ झाला की प्रस्तुति के हर अंश में विशिष्टता झलकी। उनके साथ तबले पर बनारस घराने के पं. गोपाल मिश्र ने संगत की। इसके उपरांत प्रो. रंजना श्रीवास्तव के नेतृत्व में उनकी शिष्य मंडली ने कथक की भावपूर्ण प्रस्तुति की। स्वप्निल, सत्यंबदा, आकांक्षा राय, पूजा, वसुंधरा एवं पायल दास ने नृत्य में सहयोग किया। गायन विजय कपूर, तबले पर भोलानाथ मिश्र, सितार पर अभिषेक महाराज, बांसुरी पर निरंजन भंडारी, कोरस में रुचिता और श्वेता द्विवेदी ने हिस्सेदारी निभाई। इससे पूर्व माल्यार्पण एवं दी से कार्यक्रम का शुभारंभ है। प्रो. कमल शील, प्रो. एआर. रघुवंशी, डा. शारदा वेलंकर एवं डा. बी.बालाजी ने दीप प्रज्जवलन किया। कार्यक्रम का संचालन डा. सुप्रिया शाह एवं डा. कुमार अंबरीश चंचल ने किया।

इनसेट
दूसरे दिन चमत्कृत किया ताल यात्रा ने
वाराणसी। महामना स्मराणोत्सव की द्वितीय संध्या की प्रथम प्रस्तुति के रूप संगीत एवं मंच कला संकाय के कलाकारों ने ताल यात्रा का चमत्कृत कर देने वाला प्रदर्शन किया। सात जोड़ी तबले जब सारंगी, सितार और हारमोनियम के साथ मुखर हुए तो सभागार में उपस्थित प्रत्येक श्रोता स्वयं को रोमांचित होने से रोक न सका। डा. प्रवीण उधव के नेतृत्व में पं. सुरेश तलवरकर की संकल्पना साकार हुई। सारंगी पर पं. संतोष मिश्र, सितार पर नीरज मिश्र, हारमोनियम पर इंद्रदेव चौधरी, तबले पर चंदन विश्वकर्मा, पंकज शर्मा, आशीष मिश्र, आशीष कुमार मिश्र, श्रुतिशील, सिद्धार्थ भट्टाचार्य पर संगत की। पड़ंत दीपक ने और भैरवी ने गायन किया। सौंदर्यतत्व का एकात्मक रूप, पारंपरिक बंदिशों की सांगीतिक प्रस्तुति की गई। मिश्रखमाज झप ताल में बदन श्याम सुंदर...द्रुत तीन ताल में राग ेसोहनी में जा जा रे जा बलमा...की मनोहारी प्रस्तुति की।

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