अब घर में हो सकेगी डायलिसिस

Varanasi Updated Sat, 01 Dec 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। मुंबई आईआईटी के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे आने वाले दिनों में किडनी की बीमारी की डायलिसिस अस्पताल के बजाय घर में ही हो सकेगी। जहां तक इसकी कीमत की बात है तो अभी यह तय नहीं किया गया है, लेकिन निर्माण कंपनियों पर दबाव बनाया जाएगा ताकि आम आदमी को ध्यान में रखते हुए इसकी कीमत निर्धारित की जा सके। वैसे वैज्ञानिकों द्वारा रक्त शुद्धीकरण के लिए विकसित नैनो कंपोजिट पोली सल्फान तकनीक का इस्तेमाल अस्पतालाें में होने लगा है। इससे अब किडनी की बीमारी की डायलिसिस तीन-चार घंटे के बजाय मात्र एक घंटे में ही हो जाएगी।
मुंबई आईआईटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के डा. जयेश आर बेलारे के नेतृत्व में वैज्ञानिकाें की टीम ने तीन साल पूर्व त्वरित डायलिसिस पर शोध कार्य शुरू किया था। वैज्ञानिकाें ने नैनो कंपोजिट पोली सल्फान तैयार किया। यह प्लास्टिक की ट्यूब है जिसमें छोटे-छोटे नैनो पार्टिकल होते हैं। ये रक्त शुद्धीकरण की प्रक्रिया को तेज करने में सहायक है। यह शोध पूरा होने के बाद वैज्ञानिकाें ने ऐटहोम मशीन की डिजायन तैयार की जो छोटी होने के कारण कहीं भी उठाकर ले जाई जा सकती है। बीएचयू में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के सम्मेलन में भाग लेने आए डा. जायेश आर बेलारे ने बताया कि दो-तीन सालाें में यह मशीन बाजार में उपलब्ध हो जाएगी। इसके बाद लोग इसका इस्तेमाल घरों में भी करने लगेंगे।
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सोलर लाइट सिस्टम और सस्ता होगा
वाराणसी। सोलर लाइट सिस्टम का इस्तेमाल गांव-गांव में हो सके, इस उद्देश्य से वैज्ञानिक शोध कार्य में जुटे हैं। मुंबई आईआईटी के प्रो. जुजर वासी के नेतृत्व में वैज्ञानिकाें की टीम ने सिलकन नैनो क्रिस्टल विकसित की है जो सोलर सिस्टम से उत्पन्न ऊर्जा को दोगुना कर देती है। नेशनल सेंटर फार फोटो बोल्टेक रिसर्च एंड एजुकेशन मुंबई में इसका इस्तेमाल किया जा चुका है। बीएचयू में आयोजित सम्मेलन में भाग लेने आए प्रो. जुजर ने बताया कि सौ वैज्ञानिकाें की टीम डाइलेसेटाइज सोलर सिस्टम पर शोध कर रही है। वैज्ञानिक ऐसा उपकरण विकसित करने में लगे हैं जिसकी कीमत तीन से चार हजार रुपये होगी। यह उपकरण दो किलोवाट बिजली पैदा करेगा। इससे तीन पंखा और पांच बल्ब रातभर चलेगा।
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एम्स तैयार कर रहा युवा वैज्ञानिक
वाराणसी। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) देश में युवा वैज्ञानिक तैयार करने के लिए विशेष कार्ययोजना चला रहा है। इसमें देश भर से मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानाें से पांच छात्र-छात्राआें का चयन किया जाता है। चुने गए विद्यार्थियों से अमेरिका की स्टैंडफर्ड यूनिवर्सिटी में डेढ़ साल तक शोध कराया जाता है। स्वदेश लौटकर प्रत्येक छात्र-छात्राएं तमाम आइडिया देते हैं जिनपर शोध किया जाता है। यह योजना छह साल से चल रही है। अब तक देश में 30 युवा वैज्ञानिक प्रशिक्षित हो चुके हैं। यह जानकारी सम्मेलन में आए एम्स के डा. बलराम भार्गव ने दी। उन्हाेंने बताया कि प्रशिक्षित युवा वैज्ञानिक मेडिकल डिवाइस, दस प्रोडक्ट, 22 पेटेंट और दो कंपनियां स्थापित कर चुके हैं।

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