समय के साथ बढ़ती गई रोशनी

Varanasi Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। काशी में पतित पावनी गंगा के घाटों से गोमती तक फैली देव दीपावली की दीपमालाओं की शृंखला का प्रकाश अब शहर तक फैल गया है। कुंडों, तालाबों से लेकर पेड़ों की टहनियों तक दीये सजने से यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले वर्षों में इस पर्व का स्वरूप और विराट होगा।
दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बनी देव दीपावली की शुरुआत संगठित रूप में पहली बार 1986 में पंचगंगा घाट से हुई थी। मान्यता है कि कभी तीनों लोकों में आतंक का पर्याय रहे त्रिपुरासुर का जब भगवान शिव ने वध किया तो चराचर के स्वामी त्रिपुरारी के अभिनंदन में देवताओं ने दीये जलाकर खुशी मनाई थी। उन्होंने भक्तिमार्ग के प्रवर्तक संत रामानंद की तपस्थली पंचगंगा घाट पर 15 फीट ऊंचा हजारा दीप स्तंभ बनवाकर उसे कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रज्ज्वलित किया था। 1930 में पहली बार काशी नरेश ने अंग्रेजों के साथ युद्ध में शहीद हुए अपने सैनिकों के नाम पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही दीये जलवाए थे। इसके बाद भी इस परंपरा को गति नहीं मिल सकी। 1986 में मंगलागौरी, दूध विनायक, चौखंभा, रामघाट के कुछ युवकों ने पंचगंगा घाट से देव दीपावली के दीयों से सपनों की अल्पना को आकार दिया। शहर के मध्य 31 कुंडों के अलावा रामनगर किला और उसके आसपास के घाट ही नहीं वरुणा और चोलापुर ब्लाक के ग्रामीण इलाके में गोमती के तट भी देव दीपावली के प्रकाश पुंज से जगमगा उठे हैं।

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